मध्य प्रदेश

प्रोबेशन पीरियड मामले में SC जाएगी MP सरकार; HC ने कमलनाथ सरकार के आदेश को अवैध माना था

मध्य प्रदेश के करीब एक लाख कर्मचारियों के लिए ये खबर निराशाजनक है। कर्मचारियों के प्रोबेशन पीरियड में वेतन कटौती को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट ने जो फैसला दिया है उसके खिलाफ प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी कर रही है।

दरअसल, पिछले ही महीने हाईकोर्ट ने तत्कालीन कमलनाथ सरकार के विवादास्पद प्रोबेशन वेतन कटौती नियम को अवैध और भेदभावपूर्ण करार दिया था। कोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि जिन कर्मचारियों की सैलरी काटी गई है, उन्हें एरियर्स समेत पूरी राशि लौटाई जाए।

अब सरकार यदि सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाती है तो करीब 400 करोड़ रुपए के एरियर भुगतान की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है।

 

शिवराज सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो कोर्ट पहुंचे कर्मचारी कमलनाथ सरकार के सत्ता से बाहर होने के बाद जब शिवराज सिंह चौहान दोबारा मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने इस नियम को बदलने का सार्वजनिक रूप से वादा किया था। 2023 के विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, उन्होंने कई मंचों से यह घोषणा की थी कि प्रोबेशन पीरियड को चार साल से घटाकर वापस दो साल किया जाएगा और वेतन कटौती समाप्त की जाएगी।

यह घोषणा कभी धरातल पर नहीं उतर सकी और कर्मचारियों को पुराने नियम के तहत ही काम करना पड़ रहा था। सरकारी वादे के पूरा न होने और लगातार हो रहे आर्थिक नुकसान के कारण कर्मचारियों ने अंततः न्याय के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

हाईकोर्ट का फैसला: ये नियम नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ कर्मचारियों की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस दीपक खोत की डिवीजन बेंच ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने प्रोबेशन पीरियड में सरकारी कर्मचारियों का वेतन कम देने के नियम को न केवल गलत, बल्कि भेदभावपूर्ण और नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ माना।

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट रूप से कहा-

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जब कर्मचारियों से पूरा काम लिया जा रहा है, तो उन्हें पूरा वेतन भी मिलना चाहिए।

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इस फैसले का सबसे मजबूत आधार प्रदेश में एक ही पद के लिए दो अलग-अलग नियमों का होना भी था। परिपत्र में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) से नियुक्त कर्मचारियों और कर्मचारी चयन मंडल से भर्ती कर्मचारियों के लिए अलग-अलग नियम बनाए गए थे।

MPPSC से चयनित कर्मचारियों के लिए प्रोबेशन पीरियड केवल 2 साल का था और उन्हें पहले साल से ही पूरा वेतन दिया जा रहा था। वहीं, कर्मचारी चयन मंडल से भर्ती कर्मचारियों को 4 साल के प्रोबेशन और कटौती वाले वेतन का सामना करना पड़ रहा था। हाईकोर्ट ने इसे समानता के अधिकार का खुला उल्लंघन माना और 12 दिसंबर 2019 के परिपत्र को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया।

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