बंगाल में इस साल भाजपा की सरकार बन गई है, लेकिन रंजीता और उनका परिवार अब भी कोलकाता लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा:जान बचाने के लिए रातो-रात छोड़ा पश्चिम बंगाल, अब वापस जाने से लगता है डरतेजाब फेंका, पत्थर मारे, रेप की धमकी दी

“मेरे ऊपर तेजाब फेंका गया, पत्थर मारे गए, रेप की धमकियां दी गईं और फिर एक रात सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा, ताकि हम जिंदा बच सकें…।”
ये शब्द हैं रंजीता प्रमाणिक के, जिनकी जिंदगी कभी कोलकाता की भीड़-भाड़ वाली गलियों में सामान्य ढंग से गुजरती थी। आज वही रंजीता एक व्हीलचेयर तक सीमित हैं।
कभी भाजपा महिला मोर्चा की सक्रिय कार्यकर्ता रहीं रंजीता इन दिनों अपने परिवार के साथ भोपाल के एक छोटे से किराए के कमरे में रह रही हैं।
उनका कहना है कि परिवार को अगस्त 2021 में जान बचाने के लिए रातो-रात कोलकाता छोड़ना पड़ा था।
बंगाल में इस साल 9 मई को भाजपा की सरकार बन गई है, लेकिन रंजीता और उनका परिवार अब भी कोलकाता लौटने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा।
क्या है रंजीता की पूरी कहानी, क्यों कोलकाता नहीं लौटना चाहतीं और अब भाजपा से क्या उम्मीदें हैं? पढ़िए रिपोर्ट…

कई पीढ़ियों से कोलकाता में रह रहा था परिवार
रंजीता बताती हैं कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से कोलकाता में रह रहा था। धार्मिक और आध्यात्मिक माहौल वाले बंगाली ब्राह्मण परिवार की जिंदगी सामान्य थी। वर्ष 2015-16 के आसपास मैं भाजपा महिला मोर्चा से जुड़ी, जबकि भाई रंजन हिंदूवादी संगठनों के साथ सक्रिय होने लगे।
छेड़खानी, घर पर पत्थर फेंकने की घटनाएं शुरू हो गईं
परिवार का कहना है कि शुरुआत में सब सामान्य था, लेकिन जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल की राजनीति गर्माने लगी, वैसे-वैसे उनके लिए हालात बदलते गए। रंजीता बताती हैं कि महिला मोर्चा से सक्रिय रूप से जुड़ने के बाद उन्हें रास्ते में रोकना, गंदे कमेंट करना, छेड़खानी और घर पर पत्थर फेंकने जैसी घटनाएं शुरू हो गईं।
2021 विधानसभा चुनाव के दौरान और तनाव बढ़ गया
परिवार ने पहले इन घटनाओं को नजरअंदाज किया, लेकिन 2021 विधानसभा चुनाव के दौरान माहौल और तनावपूर्ण हो गया। रंजीता के मुताबिक, उन्हें लगातार धमकियां मिलने लगीं। परिवार का दावा है कि चुनाव के बाद हालात और ज्यादा हिंसक हो गए।
चेहरा बच गया, लेकिन शरीर जल गया
रंजीता ने बताया कि एकादशी के दिन मैं गो-माता को खाना खिलाने बाहर गई थी। उसी दौरान मुझ पर हमला हुआ। वे कहती हैं- मैं नीचे झुक गई, इसलिए चेहरा बच गया, लेकिन तेजाब नीचे गिर गया। पूरा शरीर जल गया।’
इस हमले के बाद उनके शरीर का निचला हिस्सा बुरी तरह प्रभावित हो गया। धीरे-धीरे तेजाब का असर बढ़ता गया। शरीर सिकुड़ने लगा। हड्डियां टेढ़ी हो गईं। चलना-फिरना मुश्किल हो गया। रंजीता बताती हैं- मैं चल नहीं पाती थी। पूरा शरीर सूख गया था। शरीर मुड़ गया था।’
कोर्ट पहुंचे तो आरोपियों ने रेप की धमकी दी
परिवार का दावा है कि मामला कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन वहां भी उन्हें दबाव और धमकियों का सामना करना पड़ा। रंजीता कहती हैं- हमला करने वाले बोले- केस वापस लो, नहीं तो तुम्हारी मां का रेप कर देंगे। पूरे परिवार को जिंदा जला देंगे।
डर और असुरक्षा के कारण परिवार ने आखिरकार मामला वापस ले लिया। इसके बाद धमकियों का सिलसिला और तेज हो गया। रंजीता के पिता रबिन प्रमाणिक कोलकाता के बड़ा बाजार इलाके में काम करते थे। वे बताते हैं कि चुनाव के बाद माहौल पूरी तरह बदल गया था। दुकान में आकर लाइट तोड़ दी। धमकी दी कि यहां नहीं रह सकते।
रबिन कहते हैं कि उनका परिवार पीढ़ियों से कोलकाता में रह रहा था। वहां घर था। काम था और सम्मानजनक जिंदगी थी, लेकिन हालात ऐसे बने कि उन्हें सबकुछ छोड़ना पड़ा। दादा-परदादा का घर था। सब छोड़कर रातो-रात भागना पड़ा।
इलाज के लिए शहर-शहर भटकता रहा परिवार
कोलकाता छोड़ने के बाद परिवार सबसे पहले जयपुर पहुंचा। वहां सवाई मान सिंह अस्पताल में रंजीता का इलाज शुरू हुआ। रंजीता ने बताया कि पैर टेढ़े हो गए थे। डॉक्टरों ने रॉड डालकर सीधा किया।
इलाज लंबा चला। धीरे-धीरे परिवार की जमा पूंजी खत्म होने लगी। घर का सामान, बचत और कमाई सब इलाज में खर्च हो गया। पैसा खत्म हो गया। फिर सोचा कि काशी चलेंगे। वहीं बाकी जिंदगी बिताएंगे। इसके बाद परिवार वाराणसी पहुंचा। वहां रामकृष्ण मिशन और कई आयुर्वेदिक संस्थानों में इलाज कराया। कुछ समय वृंदावन में भी गुजारा।
जहां गए, लोगों ने कुछ मदद की। किसी ने खाना दिया। किसी ने दवा। वे कहती हैं कि कई संतों और धार्मिक संस्थाओं ने भी कठिन समय में उनका साथ दिया।

भोपाल में राहत और सहारा मिला
कई शहरों में भटकने के बाद परिवार भोपाल पहुंचा। यहां उनकी मुलाकात बजरंग दल के कार्यकर्ताओं और कुछ स्थानीय लोगों से हुई। रंजीता कहती हैं- यहां लोगों ने बहुत मदद की। आधार कार्ड बना, वोटर कार्ड बना, राशन मिला। वे कमरे में रखा गैस सिलेंडर दिखाते हुए कहती हैं- ये भी मदद से मिला है।
आज परिवार भोपाल के एक छोटे से किराए के कमरे में रह रहा है। हर महीने किराया और बिजली मिलाकर पांच से छह हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि कई बार दवाओं का इंतजाम करना भी मुश्किल हो जाता है।
रबिन प्रमाणिक कहते हैं कि हम कोलकाता में भिखारी नहीं थे। हमारा घर था। काम था। आज बेटी की दवा के लिए हाथ फैलाना पड़ता है। यह कहते हुए उनकी आंखें भर आती हैं।
भाई हिंदूवादी संगठन से जुड़ा तो उसे भी पीटा
रंजीता के भाई रंजन प्रमाणिक भोपाल में एक फैक्ट्री में सिक्योरिटी गार्ड हैं। वे भी हिंदूवादी संगठनों से जुड़े रहे हैं। रंजन का आरोप है कि कोविड काल के दौरान उन्हें भी निशाना बनाया गया। उनका कहना है कि उन्हें खंभे से बांधकर पीटा गया। संगठन छोड़ने की धमकी दी गई।
परिवार का कहना है कि राजनीतिक विचारधारा के कारण उन्हें लगातार प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और अंत में अपना शहर छोड़ना पड़ा।

अब बंगाल लौटने से लगता है डर
भोपाल में धीरे-धीरे परिवार ने नई जिंदगी शुरू करने की कोशिश की है, लेकिन पुराने जख्म अब भी ताजा हैं। रंजीता की मां बताती हैं कि उनकी बेटी आज भी रात में डरकर उठ जाती है। कई बार पुरानी बातें याद कर रोने लगती है।
रंजीता कहती हैं- अब वहां जाने से डर लगता है। ऐसा लगता है मार देंगे। परिवार अब पश्चिम बंगाल लौटना नहीं चाहता। भाजपा की सरकार बनने के बाद भी उनमें वापस लौटने की हिम्मत नहीं है।



