सेना ने बनाई स्वदेशी स्टील से बनी ‘शेर’ AK-203 राइफल:एक मिनट में 700 राउंड फायर होंगे; 800 मीटर तक लगा सकती है निशाना


भारतीय सेना के जवानों के साथ अब बॉर्डर पर तैनात जवान देश में बनी स्वदेशी राइफल का उपयोग में लेंगे। इसे यूपी के अमेटी जिले के कोरवा में बनाया गया है। लेकिन, इसका ट्रायल राजस्थान से सटे बॉर्डर पर हुआ था।
सात दिन पहले प्रदेश के बॉर्डर इलाकों में इसके सफल ट्रायल के बाद मंजूरी मिल गई है। सेना ने इसे शेर AK-203 नाम दिया है। ऐसे में दिसंबर के अंतिम सप्ताह तक इसे जवानों को सौंपा जाएगा।
बताया जा रहा है कि बॉर्डर पर तैनात जवानों को इंसास राइफल की जगह स्वदेशी स्टील से बनी नई शेर AK-203 राइफल दी जाएगी।

मेनुफेक्चरिंग और स्वदेशीकरण की छलांग
सेना ने इसका वीडियो भी जारी किया है। वीडियो में ‘शेर’ को असेंबली लाइन से निकलते और अत्यधिक विपरीत मौसम की परिस्थितियों में भी अचूक फायरिंग करते हुए दिखाया गया है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शुरुआत में केवल 5 प्रतिशत स्थानीय सामग्री से बनने वाली यह राइफल अब 70 प्रतिशत भारतीय स्टील और कलपुर्जों से तैयार की जा रही है।
भारत-रूस के संयुक्त उपक्रम इंडो-रूसी राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड (IRRPL) द्वारा संचालित यह फैक्ट्री 8.5 एकड़ में फैली है, जिसमें भारत की हिस्सेदारी 50.5% है।
यह ‘मेक इन इंडिया’ की एक बड़ी जीत है, और IRRPLने घोषणा की है कि दिसंबर 2025 तक इसे पूरी तरह से 100% स्वदेशी संसाधनों से तैयार किया जाएगा।
पुरानी INSAS को अलविदा
यह नई राइफल भारतीय सेना में दशकों से इस्तेमाल हो रही INSAS (इंसास) राइफल प्रणाली का चरणबद्ध तरीके से स्थान लेगी।
इंसास 5.56 मिमी कैलिबर की गोली का उपयोग करती थी, जबकि ‘शेर’ 7.62 मिमी कैलिबर की अधिक शक्तिशाली और प्रभावी गोली का इस्तेमाल करती है। यह बदलाव सेना को बेहतर थ्रू पुट, तेज फायरिंग और उच्च विश्वसनीयता प्रदान करेगा।
रणनीतिक ताकत और लक्ष्य एके-203 ‘शेर’ की तकनीकी विशेषताएं इसे दुनिया की सबसे घातक राइफलों में से एक बनाती हैं। इसकी फायरिंग क्षमता प्रति मिनट लगभग 700 राउंड है और इसकी प्रभावी दूरी लगभग 800 मीटर है। इसे हिमालय की ऊंची ऊंचाई, रेगिस्तानी इलाकों या घने सीमा क्षेत्रों-हर प्रकार के अत्यधिक प्रतिकूल भू-वातावरण में भी भरोसेमंद पाया गया है।
बताया जा रहा है कि पिछले सप्ताह रेगिस्तान से सटे बॉर्डर इलाकों में इस गन का ट्रायल किया गया था। ताकि ताकि विषम परिस्थितियों में इसका परीक्षण किया जा सके, जो सफल रहा। अब सेना के साथ व भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर तैनात सीमा सुरक्षा बल को सौंपा जाएगा।
इस आधुनिकीकरण अभियान के तहत, इस साल के अंत तक सेना को लगभग 75,000 नई एके-203 राइफलें सौंपने का टारगेट रखा है। इस पूरी परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 5,200 करोड़ है।
रक्षा-निर्यात का नया चैप्टर यह परियोजना न केवल देश की सुरक्षा के लिए बल्कि भविष्य के रक्षा-निर्यात के लिए भी महत्वपूर्ण है। IRRPL की योजना है कि स्वदेशीकरण पूरा होने के बाद उत्पादन को तेजी से बढ़ाया जाएगा ताकि प्रति वर्ष लगभग 1.5 लाख यूनिट का उत्पादन किया जा सके। इसके बाद, इस मॉडल का निर्यात भी किया जाएगा, जिससे भारत रक्षा-विनिर्माण के वैश्विक मानचित्र पर अपनी स्थिति मजबूत कर सकेगा।
AK-203 ‘शेर’ का सेना में शामिल होना एक संकेत है कि भारत अपनी रक्षा-आवश्यकताओं के लिए अब तेजी से स्वदेशी समाधानों पर निर्भर हो रहा है, जो देश की सुरक्षा और संप्रभुता को एक नया आयाम देगा।
क्या है IRRPL
IRRPL का मतलब ‘इंडो-रूस राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड’ है, जो उत्तर प्रदेश के अमेठी में स्थित एक हथियार निर्माता है, जो मुख्य रूप से भारतीय सेना के लिए AK-203 असॉल्ट राइफल बनाती है। यह रूस की कलाश्निकोव और रोसोबोरोनएक्सपोर्ट के साथ मिलकर एक संयुक्त उद्यम है, जो “मेक इन इंडिया” पहल का हिस्सा है।
इस सुविधा में उत्पादन शुरू हो गया है और धीरे-धीरे इसे पूरी तरह से स्वदेशी बनाने की ओर ले जाया जा रहा है। इसकी स्थापना 2019 में की गई थी। यह एक संयुक्त उद्यम है जिसमें भारतीय शेयरधारक एडवांस्ड वेपन्स एंड इक्विपमेंट इंडिया लिमिटेड (AWEIL) और म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड (MIL) भी शामिल हैं।



