प्रेमानंद महाराज से पूछा- क्या करें कि हिम्मत न टूटे:मूक-बधिर बच्चों ने भजन पर डांस किया, संत हाथ जोड़कर एकटक देखते रहे

कानपुर के मूक-बधिर बच्चों ने वृंदावन में प्रेमानंद महाराज से मुलाकात की। उनसे अपने हावभाव के जरिए सवाल किए। खुद तैयार किए भजन पर नृत्य किया। इस दौरान महाराजजी भजन में लीन दिखाई दिए। हाथ जोड़कर एक टक बच्चों को निहारते रहे।
दरअसल, रविवार शाम राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त दिव्यांग डेवलपमेंट सोसायटी की अध्यक्ष मनप्रीत कौर मूक बधिर बच्चों को लेकर पहुंची थीं। मनप्रीत ने कहा- ये बच्चे सुन या बोल नहीं सकते। कुछ लोग हमें पागल कहते हैं। चालाक कहते हैं। ऐसा करें कि हमारी और बच्चों की हिम्मत न टूटे। क्या करें?
इस पर प्रेमानंद महाराज ने कहा कि बड़े सौभाग्य की बात है कि आप ऐसे बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं। आप बहुत धन्यवाद की पात्र हैं। स्वाथीं लोग कुछ भी कहते रहें। ऐसे लोगों को प्यार और उत्साह देना ही आपकी महानता है, जो आपने सबको छोड़कर इनको स्वीकार किया है।

आइए विस्तार से जानते हैं प्रेमानंद महाराज से पूरी बातचीत
‘आशीर्वाद दीजिए हम सबका धैर्य ना टूटे’
मनप्रीत कौर ने पूछा- महाराज जी कुछ लोग पागल कहते हैं, कुछ लोग चालाक कहते हैं। हम अपनी मौज में काम कर रहे हैं। जितने हमारे साथ लोग जुड़े हैं, सब अपनी मौज में काम कर रहे हैं। आपसे बस आशीर्वाद हमें चाहिए कि हम सबका धैर्य ना टूटे। हम सब की हिम्मत बनी रहे।
‘ऐसे बच्चों को दुलार देना आपकी महानता’
प्रेमानंद महाराज ने कहा- बड़े सौभाग्य की बात है कि आप मां का वात्सल्य लेकर ऐसे बच्चों का भी पालन पोषण कर रहे हैं। ऐसे बच्चों को भी उत्साह दे रहे हैं, नहीं तो ऐसे बच्चे जीवन से निराश हो जाते हैं। आप बहुत धन्यवाद के पात्र हैं। आप ऐसे ही करते रहिए। लोग क्या जानें ये सब। सब स्वार्थी लोग हैं। आप परमार्थ में चल रही हैं। ये शुद्ध परमार्थ है। क्योंकि ऐसे ऐसों के मन में उत्साह, ऐसों को प्यार देना, ऐसे को दुलार देना, ये आपकी महानता है।
इन बच्चों को अध्यात्म से कैसे जोड़ें?
मनप्रीत कौर ने पूछा- महाराज जी हम इन बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इन बच्चों के सामाजिक उत्थान का प्रयास कर रहे हैं। इन बच्चों को अध्यात्म से कैसे जोड़ें? हमें वह मार्गदर्शन दीजिए।
;नाम जप से हृदय निर्मल होने लगेगा’
प्रेमानंद महाराज ने कहा- अगर किसी भी तरह नाम जप करने लगे, प्रभू का स्मरण करने लगे, मतलब आपके निर्देशन से तो बात बन जाए। राधा, राधा, राधा… तो इनका हृदय निर्मल होने लगेगा। निष्पाप होने लगेंगे। इसका मंगल होने लगेगा।

बच्चों ने गाया- अरे मन ले चल वृंदावन… इस दौरान बच्चों ने महाराज जी के सामने भजन प्रस्तुत करने की बात कही। प्रेमानंद महाराज की सहमति के बाद बच्चों ने भजन पर परफॉर्म किया। हाथों में फूल माला और कुमकुम से राधा-कृष्ण जैसा श्रृंगार कर बच्चों ने भजन गाया–
अरे मन ले चल वृंदावन… अरे मन ले चल वृंदावन यमुना के तट लेके चल… ले चल राधा के चरणन अरे मन ले चल वृंदावन… बंसीवट… श्रृंगार वट और केशी घाट राधा बात करनी है रज वंदन… अरे मन ले चल वृंदावन अरे मन ले चल यमुना के तट… ले के चल राधा के चरणन।
हाथ जोड़कर ध्यान से बच्चों का नृत्य देखते रहे
बच्चों की प्रस्तुति देखकर प्रेमानंद ती बहुत खुश हुए। हाथ जोड़कर ध्यान से भजन सुनते रहे। बोले- बहुत बड़ी सुंदर प्रस्तुति। प्रेमानंद महाराज ने मनप्रीत कौर के इस तरह के बच्चों की सेवा और शिक्षा पर सराहना की है। संस्था की अध्यक्ष और बच्चों को आशीर्वाद दिया।
अब संत प्रेमानंद महाराज की कहानी
13 साल की उम्र में घर छोड़ा प्रेमानंद महाराज का जन्म यूपी में कानपुर जिले की नरवल तहसील के अखरी गांव में हुआ था। पिता शंभू नारायण पांडे और मां रामा देवी हैं। 3 भाई हैं, प्रेमानंद मंझले हैं। बचपन में प्रेमानंद जी का नाम अनिरुद्ध कुमार पांडे था। वह बचपन से ही आध्यात्मिक रहे। कक्षा 8 तक पढ़ाई की है।
बचपन में अनिरुद्ध ने अपनी सखा टोली के साथ शिव मंदिर के लिए एक चबूतरा बनाना चाहा। इसका निर्माण भी शुरू करवाया, लेकिन कुछ लोगों ने रोक दिया। इससे वह मायूस हो गए। उनका मन इस कदर टूटा कि घर छोड़ने का फैसला कर लिया। वह कानपुर होते हुए काशी पहुंचे।

जब 13 साल के हुए तो उन्होंने ब्रह्मचारी बनने का फैसला किया। शुरुआत में प्रेमानंद महाराज का नाम ‘आरयन ब्रह्मचारी’ रखा गया। काशी में उन्होंने करीब 15 महीने बिताए। उन्होंने गुरु गौरी शरण जी महाराज से गुरुदीक्षा ली। फिर वह मथुरा आ गए।
संन्यासी से राधावल्लभी संत बन गए प्रेमानंद महाराज प्रेमानंद महाराज वृंदावन पहुंचकर हर रोज बांके बिहारी जी के दर्शन करते। फिर रासलीला रास आई और राधावल्लभ के कार्यक्रमों में जाने लगे। वहां घंटों खड़े रहते।
एक दिन एक संत ने श्री राधारससुधानिधि से एक श्लोक पढ़ा, लेकिन महाराज उसे समझ नहीं पाए। फिर एक दिन वृंदावन की परिक्रमा करते समय एक सखी को एक श्लोक गाते हुए सुना। उसे सुनकर महाराज ठिठक गए।

श्लोक ऐसा रास आया कि अपना संन्यास धर्म तोड़कर वो उस सखी के पास गए। उससे श्लोक का मतलब पूछा। सखी ने कहा- इसका मतलब समझने के लिए राधावल्लभी होना जरूरी है। इस तरह महाराज राधावल्लभी हो गए।