अयोध्या | उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को समाजवादी पार्टी (सपा) पर अपना हमला तेज कर दिया और आरोप लगाया कि सत्ता में रहते हुए मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा किए गए चढ़ावे का दुरुपयोग किया गया और उसे मस्जिद की दीवारों के निर्माण में लगा दिया गया। यह टिप्पणी अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी को लेकर चल रहे राजनीतिक विवाद के बीच आई है।
अयोध्या में एक जनसभा को संबोधित करते हुए, मुख्यमंत्री ने दावा किया कि समाजवादी पार्टी ने अपनी सरकार के दौरान मंदिरों पर नियंत्रण कर लिया था और श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए धन का गबन किया। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि मंदिर विकास के लिए तय धन के बजाय मस्जिद की दीवारों के निर्माण में इस्तेमाल किया गया, और विपक्षी दल पर हिंदू धार्मिक भावनाओं की अवहेलना करने का आरोप लगाया।
मुख्यमंत्री ने धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर समाजवादी पार्टी के रुख की भी आलोचना की और कहा कि ऐसे रिकॉर्ड वाली पार्टी को आस्था या विकास के मामलों पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से सवाल करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार मंदिर मामलों के प्रबंधन में पारदर्शिता सुनिश्चित करते हुए धार्मिक संस्थानों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
मुख्यमंत्री की टिप्पणियां राम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट में चढ़ावे से जुड़ी कथित अनियमितताओं की जांच की पृष्ठभूमि में आई हैं। इससे पहले, चोरी के आरोप सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया था। योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि दोषी पाए गए लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है, साथ ही लोगों से कुछ व्यक्तियों की करतूतों के आधार पर पूरे ट्रस्ट की प्रतिष्ठा को धूमिल न करने का आग्रह किया।
इन आरोपों ने उत्तर प्रदेश में आगामी चुनावी लड़ाइयों से पहले भाजपा और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव को और बढ़ा दिया है। भाजपा ने समाजवादी पार्टी पर आस्था के मामलों का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है, साथ ही अयोध्या, काशी और मथुरा को प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में विकसित करने की अपनी पहलों को भी उजागर किया है।
इस रिपोर्ट के प्रकाशन के समय तक, समाजवादी पार्टी ने मंदिर के चढ़ावे के कथित दुरुपयोग को लेकर योगी आदित्यनाथ के ताजा आरोपों पर कोई विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी थी। मुख्यमंत्री द्वारा किए गए दावे राजनीतिक आरोप बने हुए हैं और किसी न्यायिक निष्कर्ष या आधिकारिक जांच के माध्यम से स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं हुए हैं।
यह विवाद उत्तर प्रदेश में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बने रहने की उम्मीद है, जिसमें सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष दोनों भविष्य के चुनावों की तैयारी में शासन, धार्मिक संस्थानों और सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर आरोप-प्रत्यारोप जारी रखने की संभावना है।


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