सनातन धर्म और शास्त्रों की मान्यता के अनुसार, भगवती मां दुर्गा अत्यंत दयामयी हैं और वे केवल साधक के सच्चे भाव, श्रद्धा और भक्ति को देखती हैं। यदि किसी प्राकृतिक, शारीरिक या आकस्मिक परिस्थिति के कारण नवरात्रि का व्रत, पूजन या अनुष्ठान बीच में रुक जाता है, तो इससे साधक को किसी प्रकार का पाप या दोष नहीं लगता।

धर्मशास्त्रों में ऐसी विषम परिस्थितियों के लिए सरल, व्यावहारिक और शास्त्रसम्मत विकल्प बताए गए हैं। आइए जानते हैं विभिन्न कारणों के अनुसार क्या कदम उठाएं-
मासिक धर्म (Periods) शुरू हो जाने पर
• स्वयं मूर्तियों, कलश या पूजन सामग्री का स्पर्श न करें। घर का कोई अन्य सदस्य (पति, बच्चे या परिजन) आपकी ओर से दीपक प्रज्वलित कर सकता है, भोग लगा सकता है और आरती कर सकता है।
• पूजा स्थल से दूर रहकर भी आपकी भक्ति बनी रहती है। आप शारीरिक शुद्धता बनाए रखते हुए मन ही मन मां दुर्गा के सिद्ध मंत्रों (जैसे 'ॐ दुं दुर्गायै नमः') या दुर्गा चालीसा का मानसिक पाठ कर सकती हैं।
• व्रत का नियम: यदि आपका स्वास्थ्य अनुमति देता है, तो आप फलाहारी व्रत जारी रख सकती हैं। शारीरिक कमजोरी महसूस होने पर सात्विक आहार ग्रहण करें।
अस्वस्थता या बीमारी की स्थिति में
• शास्त्रों का स्पष्ट कथन है- 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' (अर्थात् धर्म के सभी साधनों का पालन करने के लिए शरीर का स्वस्थ रहना ही प्रथम साधन है)।
• यदि निर्जला या फलाहारी व्रत से स्वास्थ्य बिगड़ रहा हो, तो चिकित्सक की सलाह से दवाएं लें और सुपाच्य सात्विक भोजन (जैसे दलिया, खिचड़ी) ग्रहण करें।
• यदि आप बैठकर पूजा करने में असमर्थ हैं, तो विश्राम की अवस्था में भी मन ही मन मां का ध्यान और नाम जाप कर सकते हैं।
सूतक या पातक लगने पर (जन्म अथवा मृत्यु)
• नवरात्रि के दौरान यदि परिवार में किसी बच्चे का जन्म (सूतक) या किसी का निधन (पातक) हो जाता है, तो धार्मिक नियमानुसार मूर्तियों का स्पर्श और प्रत्यक्ष बाह्य पूजा तुरंत रोक दी जाती है।


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