भारत विकास मोर्चा (बीवीएफ) ने रविवार को अनुभवी विधायक अंजलि देशमुख को महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए अपना मुख्यमंत्री चेहरा घोषित किया, जिससे लगभग तीन हफ़्तों की उस आंतरिक खींचतान का अंत हो गया जो इस नाज़ुक गठबंधन को तोड़ने की धमकी दे रही थी। यह फ़ैसला पुणे में एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ़्रेंस में पक्का किया गया, जहाँ तीनों घटक दलों के नेता मंच पर एक साथ नज़र आए।
58 वर्षीय देशमुख, कोथरुड निर्वाचन क्षेत्र से चार बार की विधायक हैं, जिन्होंने ग्रामीण ऋण कार्यक्रमों और महिला स्वयं-सहायता समूहों के दम पर अपनी पहचान बनाई है। गठबंधन के संयोजक रमेश पाटील के साथ खड़ी उन्होंने पत्रकारों से कहा, “यह मेरी जीत नहीं है, यह साफ़-सुथरे और जवाबदेह शासन के लिए जनादेश है।” आंतरिक सर्वेक्षणों में कथित तौर पर उन्हें पहली बार वोट डालने वालों के बीच लोकप्रियता के मामले में दो प्रतिद्वंद्वी दावेदारों से आगे रखा गया था।
सीट-बँटवारा अब भी पेच बना हुआ है
एकता के इस प्रदर्शन के बावजूद दरारें साफ़ दिखीं। तीनों साझेदारों में सबसे छोटी जन शक्ति पार्टी ने राज्य की 288 में से 78 सीटों की माँग की है, जिस आँकड़े को बीवीएफ के रणनीतिकार निजी तौर पर “अव्यावहारिक” बताते हैं। नाम न छापने की शर्त पर बोलते हुए जन शक्ति के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि यदि महीने के अंत तक कोई अंतिम समझौता नहीं हुआ तो उनकी पार्टी “अपने विकल्पों पर फिर से विचार करेगी।”
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि गठबंधन का गणित बेहद बारीक संतुलन पर टिका है। सेंटर फ़ॉर इलेक्टोरल स्टडीज़ की डॉ. मीरा अय्यर ने कहा, “बीवीएफ को अपने हर साझेदार का वोट बैंक बरकरार रखना ज़रूरी है। 15 या 20 सीटों को लेकर सार्वजनिक झगड़ा उन्हें उन शहरी अनिर्णीत ज़िलों में भारी पड़ सकता है, जहाँ अंतर बेहद कम है।” उनका अनुमान है कि करीब 40 निर्वाचन क्षेत्रों का फ़ैसला 5,000 से भी कम वोटों से होगा।
तीसरी लगातार अवधि की तलाश में जुटे सत्तारूढ़ राष्ट्रीय मोर्चा ने इस ऐलान को “सुविधा का गठबंधन” कहकर ख़ारिज कर दिया। राज्य प्रवक्ता विनोद काळे ने दावा किया कि विपक्ष के पास “सरकार हटाने के अलावा कोई साझा कार्यक्रम नहीं” है, और उम्मीदवारों को अंतिम रूप देने में देरी को बिखराव का सबूत बताया।
विधानसभा के लिए मतदान अक्टूबर में दो चरणों में होने की उम्मीद है, हालाँकि चुनाव आयोग ने अभी औपचारिक रूप से तारीख़ों का ऐलान नहीं किया है। फ़िलहाल बीवीएफ ने अपनी पहली बाधा पार कर ली लगती है, लेकिन कौन कहाँ से लड़ेगा, इस पर कठिन बातचीत तो अभी शुरू ही हुई है।

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