परीक्षा और नौकरी के सवालों से शुरू हुए युवा आंदोलनों के बाद अब मतदाता सूची और चुनाव आयोग को लेकर भी युवा समूहों और विपक्षी दलों के प्रदर्शन हो रहे हैं आज का सवाल यह है कि युवा किन मुद्दों पर सड़क पर आ रहा है और क्यों? क्या रोज़गार की चिंता धीरे-धीरे संस्थाओं पर भरोसे की चिंता में बदल रही है? क्या परीक्षा में निष्पक्षता का सवाल और चुनाव में निष्पक्षता का सवाल, दोनों के पीछे व्यवस्था से न्याय मिलने के भरोसे का सवाल है? या फिर विश्लेषक अलग-अलग मुद्दों और अलग-अलग आंदोलनों को जोड़कर एक बड़ी कहानी बना रहे हैं, जबकि ज़मीन पर तस्वीर इतनी सीधी नहीं है?
सवाल सरकार के लिए भी है. क्या हर विरोध प्रदर्शन को राजनीतिक लामबंदी या विपक्षी राजनीति के चश्मे से देखना पर्याप्त है? या सरकार को यह भी पूछना होगा कि अगर लाखों युवा किसी व्यवस्था की विश्वसनीयता और उस पर अपने भरोसे को लेकर सवाल उठा रहे हैं, तो उस व्यवस्था में ऐसा क्या बदला जाए, जिससे सिर्फ़ नियम ही नहीं, बल्कि भरोसा भी बहाल हो?
सवाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने भी है कि उन्हें इतने सालों से जो जनसमर्थन हासिल रहा है, क्या उसका आधार खिसक रहा है? आगे जो युवा मतदाता के रूप में आने वाले हैं, क्या उन्हें जोड़ना बीजेपी के लिए एक चुनौती साबित हो रही है?
इन सब पहलुओं की पड़ताल के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने बात की सीएसडीएस से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार, भारतीय जनता पार्टी के नेता प्रोफे़सर गौरव वल्लभ और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी से नौकरियों और दूसरे विषयों को लेकर युवाओं के सामने जो समस्याएं हैं, वे अचानक पैदा नहीं हुई हैं. ये पिछले 10-15 साल या उससे भी पहले से बनी रही हैं. लेकिन आज एक के बाद एक आंदोलन हो रहे हैं. इसे युवाओं के संदर्भ में देखें तो क्या बदलाव हुआ है या क्या बदल रहा है?
इस सवाल के जवाब में संजय कुमार बताते हैं कि पिछले 30-35 साल से नियमित रूप से किए जाने वाले सर्वेक्षणों के दौरान एक सवाल ज़रूर पूछा जाता है कि आपके सामने या देश के सामने सबसे बड़ी समस्या क्या है?

वह कहते हैं कि आमतौर पर हर सर्वे में बेरोज़गारी एक बड़ी समस्या बनकर दिखाई पड़ती है युवा इस सवाल के जवाब में यही कहते हैं कि बेरोज़गारी सबसे बड़ी समस्या है इसलिए यह कहना ठीक है कि अचानक ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिसके कारण दिल्ली की सड़कों और देश के अलग-अलग शहरों में इतना बड़ा विरोध प्रदर्शन दिखाई पड़ रहा है संजय कुमार के अनुसार, युवाओं के अलावा अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों और देश की आम जनता को भी कहीं न कहीं यह अहसास होने लगा कि सरकार उनकी बात नहीं सुन रही है इसी का नतीजा है कि आज दिल्ली और दूसरे शहरों की सड़कों पर जनता का आक्रोश दिखाई पड़ रहा है लेकिन सत्ताधारी बीजेपी से जुड़े प्रोफ़ेसर गौरव वल्लभ कहते हैं कि सरकार असहमति का स्वागत करती है. छात्रों के मुद्दे थे. सरकार ने उन्हें सुना और स्वीकार किया. कुछ मुद्दे वास्तविक थे, उनके समाधान के लिए सशक्त समिति बनाई और उन्हें हल करने का संकल्प लिया.
जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शनों को लेकर सरकार की कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों को रोकने की कोशिशों पर सवाल उठ रहे हैं एक लोकतांत्रिक देश में यह कितना जायज़ है? इस पर गौरव वल्लभ कहते हैं कि किसी भी युवा को अपनी असहमति दर्ज कराने का पूरा अधिकार है. उसके लिए मुद्दे उठाइए, रचनात्मक चर्चा और बहस कीजिए और अपने विचार दीजिए. सरकार भी उन बातों पर अमल करेगी "मैं किसी के लिए कोई टिप्पणी नहीं कर रहा हूँ. मैं तो सीजेपी के बच्चों से भी कहना चाहता हूँ कि आपने अपनी चिंताएँ उठाईं, हमने आपको बुलाकर आपकी बात सुनी. अब आप भारत-विरोधी ताक़तों को अपने मंच पर मत आने दीजिए." एसआईआर के विरोध को लेकर वह कहते हैं कि इस पर सर्वोच्च न्यायालय भी सुनवाई कर रहा है. चुनाव आयोग राजनीतिक दलों की बात सुनने के लिए तैयार है.
"लेकिन आप रोज़ दोपहर का खाना खाकर, कनॉट प्लेस के पाँच सितारा और अच्छे रेस्तराँ में भोजन करके सड़कों पर निकल जाएँ और अराजकता फैलाएँ. संवैधानिक संस्थाओं के लिए आप अपशब्द कहें और उन्हें कमज़ोर करें. लेकिन यह सब क्यों किया जा रहा है? उनका संवैधानिक संस्थाओं से कोई लेना-देना नहीं है. वे लोकतंत्र को कमज़ोर करना चाहते हैं."
इस समय जो माहौल है, उसे सरकार-विरोधी माहौल के तौर पर देखा जाए या व्यवस्था-विरोधी माहौल के तौर पर?
इस सवाल के जवाब में संजय कुमार कहते हैं, "मुझे ऐसा नहीं लगता कि ये प्रदर्शन सरकार के कामकाज़ के ख़िलाफ़ हैं, क्योंकि कोई ऐसा संकेत मुझे दिखाई नहीं पड़ता जिससे लगे कि लोग सरकार के कामकाज़ से नाराज़ हैं. दूसरी बात यह है कि क्या संस्थाओं से नाराज़गी है? संस्थाएँ तो कई हैं. देश को चलाने के लिए तमाम तरह की संस्थाएँ होती हैं. लेकिन अगर कोई नाराज़गी दिखाई पड़ती है, तो सिर्फ़ एक ही संस्था है और वह है चुनाव आयोग","कुल मिलाकर नाराज़गी सिर्फ एक ही बात से है कि चुनाव आयोग ने एसआईआर के तहत मतदाताओं को जोड़ने और नाम हटाने का जो काम किया, क्या वह ठीक से हुआ या नहीं? सारा आक्रोश और सारी नाराज़गी सिर्फ़ चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ दिखाई पड़ती है, न कि सरकार के कामकाज़ से या किसी अन्य संस्था से." हालांकि नीरजा चौधरी को लगता है कि इन प्रदर्शनों का असर व्यापक हो सकता है क्योंकि प्रदर्शन करने वाली पीढ़ी अलग है
कॉकरोच जनता पार्टी के इन नौजवानों को सुनिए. वे कह रहे हैं कि हमें अपने भविष्य की फ़िक्र है. हमें देश के भविष्य के बारे में सोचना है. इसीलिए हम बाहर निकलेंगे. हिरासत में लिया जाता है तो लिया जाए. सरकार जो करना चाहती है, करे. हम अपनी आवाज़ उठाने वाले हैं. हम वोट की पवित्रता के लिए लड़ेंगे."
सीजेपी शिक्षा, स्वास्थ्य और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग कर रही है. अभी यह कोई राजनीतिक पार्टी नहीं है, बल्कि एक दबाव समूह है. इसमें विपक्षी पार्टियाँ जुड़ गई हैं.
तो इसका क्या असर होगा? नीरजा चौधरी कहती हैं, "मुझे लगता है कि इसका असर सभी संस्थाओं पर पड़ेगा. जैसे-जैसे लोग शांतिपूर्वक सड़कों पर उतरते हैं, नौकरशाह भी सावधान हो जाते हैं, राजनीतिक पार्टियाँ भी सावधान हो जाती हैं और न्यायपालिका भी शायद इस बात को लेकर सतर्क हो जाती है कि उसकी भूमिका क्या है.","ये सब प्रक्रियाएँ समानांतर चल रही हैं. यह सब कहाँ जाकर रुकेगा, आज कहना बहुत मुश्किल है. आज बीजेपी के लिए यह बहुत बड़ी समस्या बन गई है."


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