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बड़ी मेडिकल सर्जरी का फैसला कैसे लें:जानें सेकेंड ओपिनियन लेना क्यों जरूरी, पहले अपने डॉक्टर से पूछें ये 10 सवाल

इसलिए ‘फिजिकल हेल्थ’ में आज समझेंगे कि किसी मेडिकल डिसीजन से पहले सेकेंड ओपिनियन कितनी जरूरी है। साथ ही जानेंगे कि-
- किन बीमारियों में गलत डायग्नोसिस का रिस्क ज्यादा होता है?
- किन मामलों में सेकेंड ओपिनियन जरूर लेनी चाहिए?
- किन बीमारियों में सेकेंड ओपिनियन लेने की जरूरत नहीं होती?
एक्सपर्ट: डॉ. रोहित शर्मा, कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन, अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल, जयपुर
सवाल- सेकेंड ओपिनियन क्या है?
जवाब- सेकेंड ओपिनियन का मतलब है, किसी बीमारी के इलाज से पहले डॉक्टर की राय लेने के बाद, दूसरे डॉक्टर से भी उसी मामले पर सलाह लेना।
आमतौर पर सेकेंड ओपिनियन तब ली जाती है, जब-
- बीमारी गंभीर हो।
- ऑपरेशन या बहुट टफ ट्रीटमेंट की सलाह दी गई हो।
- पहली सलाह को लेकर मन में शक या असमंजस हो।
- इलाज के कई विकल्प मौजूद हों।
सवाल- हर बड़े मेडिकल फैसले से पहले सेकेंड ओपिनियन लेना क्यों जरूरी है?
जवाब- किसी भी बड़े मेडिकल डिसीजन से पहले सेकेंड ओपिनियन इसलिए जरूरी है, क्योंकि-
- बीमारी की सही पुष्टि हो जाती है।
- गलत डायग्नोसिस का जोखिम कम होता है।
- इलाज के दूसरे विकल्प पता चलते हैं।
- अनावश्यक सर्जरी या टेस्ट से बचाव होता है।
- इलाज के फायदे-नुकसान बेहतर समझ में आते हैं।
- डॉक्टर और इलाज चुनने में भरोसा बढ़ता है।
- बड़े खर्च से पहले सही फैसला लेने में मदद मिलती है।
- मरीज और परिवार का आत्मविश्वास बढ़ता है।
सवाल- दुनिया और भारत में मिसडायग्नोसिस कितना कॉमन है?
जवाब- देश और दुनिया, दोनों के संदर्भ में यह काफी कॉमन है। जैसेकि–
दुनिया में
- अलग-अलग स्टडीज के अनुसार लगभग 10-15% मेडिकल केसेज में मिसडायग्नोसिस होता है।
- आउटपेशेंट (OPD) सेटिंग में यह लगभग 5-15% मामलों में देखा गया है।
- कुछ रिसर्च बताती हैं कि डॉक्टर पहली बार में करीब 80% मामलों में ही सही डायग्नोसिस कर पाते हैं।
- इमरजेंसी/हॉस्पिटल सेटिंग में भी करीब 10-15% तक डायग्नोस्टिक एरर हो सकता है।
भारत में
- भारत में सटीक नेशनल डेटा सीमित है, लेकिन अलग-अलग बीमारियों पर स्टडीज दिखाती हैं कि मिसडायग्नोसिस या डिले (देरी) काफी आम है, खासकर जटिल या TB जैसी बीमारियों में।
- कुछ क्लिनिकल स्टडीज (जैसे इन्फेक्शन/सीवियर केस) में लगभग 10-12% पेशेंट्स में गलत शुरुआती डायग्नोसिस पाया गया।
- रिसोर्स-लिमिटेड एरिया (ग्रामीण/छोटे शहर) में डायग्नोसिस में देरी और गलत पहचान का जोखिम और ज्यादा होता है।



