मध्य प्रदेश

चर्चित भोजशाला मामले में मप्र हाई कोट की इंदौर बेंच में चल रही सुनवाई:भोजशाला विवाद में ASI की रिपोर्ट बनी बहस का केंद्र; जैन पक्ष ने दोहराया-भोजशाला थी जैन गुरुकुल

चर्चित भोजशाला मामले में मप्र हाई कोट की इंदौर बेंच में चल रही सुनवाई के दौरान गुरुवार को राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट के विभिन्न अंशों का हवाला देते हुए कहा कि रिपोर्ट में कई ऐसे तथ्य और निष्कर्ष दर्ज हैं, जो यह संकेत देते हैं कि विवादित स्थल पूर्व में सरस्वती मंदिर था।

यह सुनवाई हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की याचिका पर हुई। महाधिवक्ता ने कहा कि ‘धार दरबार ऐलान’ को अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता। उन्होंने इस मुद्दे पर भी विस्तार से पक्ष रखा और कहा कि इस बिंदु को पूर्व में सीनियर एडवोकेट सलमान खुर्शीद, तौसिफ वारसी और शोभा मेनन द्वारा उठाया गया था।

महाधिवक्ता ने कहा कि “धार दरबार ऐलान” को अलग रूप से पढ़कर अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता, क्योंकि स्वयं धार दरबार के प्रमुख वी. नाडकर ने पूरी कार्यवाही के दौरान यह स्वीकार किया था कि उक्त स्थल पूर्व में सरस्वती मंदिर था। उन्होंने कहा कि केवल इस कथन के आधार पर कि “यहां नमाज होती आई है, होती है और आगे भी होती रहेगी”, किसी दस्तावेज को निर्णायक नहीं माना जा सकता। इस कथन को ऐतिहासिक और विधिक संदर्भ में समग्र रूप से देखना आवश्यक है।

‘धार दरबार ऐलान’ को कानून का दर्जा नहीं

महाधिवक्ता प्रशांत सिंह ने कोर्ट को बताया कि गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट Government of India Act 1935 वर्ष 1937 में लागू हुआ था इसलिए उससे पहले जारी किसी कथित “धार दरबार ऐलान” को इस अधिनियम के आधार पर वैधानिक मान्यता नहीं दी जा सकती।

उन्होंने दलील दी कि किसी दस्तावेज या प्रावधान को “कानून” का दर्जा प्राप्त करने के लिए उसका विधायी प्रक्रिया से पारित होना आवश्यक है। जबकि “धार दरबार ऐलान” की प्रकृति ही स्पष्ट नहीं है कि वह प्रशासनिक, कार्यपालिका संबंधी या विधायी दस्तावेज था। ऐसी स्थिति में उक्त दस्तावेज को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 के तहत “विधि” नहीं माना जा सकता।

उन्होंने भारत शासन अधिनियम 1935 की धारा 311(2) का उल्लेख करते हुए कहा कि तथाकथित “धार दरबार ऐलान” को वैधानिक रूप से कानून का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

सुनवाई के दौरान सलेकचंद जैन द्वारा दायर याचिका में एडवोकेट दीपक राजभर (दिल्ली) ने भी कोर्ट के समक्ष पक्ष रखा। उन्होंने दावा दोहराया किया कि भोजशाला पूर्व में जैन गुरुकुल था और वहां जैन देवी अंबिका का मंदिर स्थित था।

अगली सुनवाई में बहस जारी रहने के संकेत

मामले में हिंदू, मुस्लिम और जैन पक्षों की ओर से लगातार ऐतिहासिक दस्तावेजों, पुरातात्विक रिपोर्टों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर दलीलें दी जा रही हैं। कोर्ट में अब “धार दरबार ऐलान”, ASI रिपोर्ट और ऐतिहासिक अभिलेखों की वैधानिक स्थिति पर बहस केंद्रित हो गई है।

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