लाइफ स्टाइल

मेंटल हेल्थ– मैं हर वक्त ओवरथिंकिंग करता हूं:चाहकर भी ब्रेन को कंट्रोल नहीं कर पाता, परेशान रहता हूं, इससे बाहर कैसे निकलूं

सवाल– मैं 28 साल का हूं और पेशे से इंजीनियर हूं। मैं हर चीज के बारे में बहुत ज्यादा सोचता हूं। मेरे मन में हमेशा बुरे ख्याल ही आते हैं। जैसे अगर पापा ने फोन पर कहा कि वो मेरे पास नहीं आ रहे हैं तो मैं घंटों ये सोचता रहूंगा कि क्या मेरी कोई बात उन्हें बुरी लग गई। क्या मुझसे कोई गलती हुई है, क्या मैंने पिछली बार कुछ कह दिया था। और ये हमेशा हरेक चीज के बारे में होता है। अगर लैंडलॉर्ड अंकल भी स्माइल का जवाब न दें तो मेरे मन में अजीब-अजीब से बुरे ख्याल आने लगते हैं कि ये मुझसे नाराज हैं। अब ये मुझे घर से निकाल देंगे। क्या ये सिर्फ ओवरथिंकिंग है या कुछ और। मैं इस प्रॉब्लम से कैसे बाहर निकलूं?

एक्सपर्ट– डॉ. द्रोण शर्मा, कंसल्टेंट साइकेट्रिस्ट, आयरलैंड, यूके। यूके, आयरिश और जिब्राल्टर मेडिकल काउंसिल के मेंबर।

ओवरथिंकिंग एक ऐसा मेंटल प्रोसेस है, जिसमें व्यक्ति छोटी-छोटी घटनाओं के बारे में भी जरूरत से ज्यादा सोचता है और उसे बहुत बड़ा बना देता है। यह आदत धीरे-धीरे एंग्जाइटी और इनसिक्योरिटी को बढ़ाती है। इससे सेल्फ डाउट पैदा होता है। व्यक्ति फैक्ट और उस फैक्ट के अपने इंटरप्रिटेशन में फर्क नहीं कर पाता। इसका असर इमोशंस और व्यवहार, दोनों पर पड़ता है।

केस का मनोवैज्ञानिक आकलन

1. मूल समस्या क्या है

इस केस में मुख्य समस्या घटना नहीं, बल्कि उसकी नकारात्मक व्याख्या है। जैसेकि–

  • व्यक्ति छोटी-छोटी सोशल या इंटरपर्सनल घटनाओं का बहुत बड़ा अर्थ निकालता है।
  • वह अस्पष्ट स्थितियों को नकारात्मक तरीके से समझता है।
  • जरा सी बात को तुंरत अपनी गलती, अपनी कमी या अपना रिजेक्शन मान लेता है।
  • उसका दिमाग एक ही विचार पर घंटों अटका रहता है।
  • वह भविष्य को लेकर सबसे बुरी संभावना के बारे में सोचता है।

2. सोचने का तरीका (कॉग्निटिव पैटर्न)

यहां सोच का एक खास तरह का पैटर्न दिखता है-

माइंड रीडिंग (दूसरों के मन को पढ़ लेना)

बिना किसी सबूत के मान लेना कि सामने वाला क्या सोच रहा है।

पर्सनलाइजेशन (हर चीज खुद से जोड़ लेना)

कुछ भी बुरा हो तो ये मान लेना कि ऐसा मेरी वजह से हुआ है।

कैटेस्ट्रोफाइजिंग (सबसे बुरा सोच लेना)

छोटी घटना से सीधे बड़े नतीजे पर पहुंच जाना।

अब इस बात को अपने ही दिए उदाहरण से समझें।

केस 1: पापा का न आना

फैक्ट: पापा मिलने नहीं आ रहे हैं।

इंटरप्रिटेशन:

“क्या मैंने कुछ गलत कहा?”

“क्या वो मुझसे नाराज हैं?”

“क्या मुझसे कोई गलती हो गई?”

यहां दिक्कत ये है कि दिमाग ‘फैक्ट’ से सीधे ‘सेल्फ ब्लेम’ पर चला जाता है।

केस 2: मकान मालिक ने स्माइल का जवाब नहीं दिया।

फैक्ट: उन्होंने स्माइल के जवाब में स्माइल नहीं दी।

इंटरप्रिटेशन:

“वो मुझसे नाराज हैं।”

“अब वो मुझे घर से निकाल देंगे।”

यहां एक न्यूट्रल घटना को भी खतरे की तरह देखा जा रहा है।

3. इसलिए बढ़ रही ओवरथिंकिंग

इवेंट- घटना समस्या नहीं है।

इंटरप्रिटेशन- उसकी व्याख्या समस्या है।

दिमाग अनिश्चितता को सहन नहीं कर पाता। इसलिए जल्दी से एक नेगेटिव कहानी बना देता है।

यह कहानी बार-बार दोहराई जाती है, जिससे ओवरथिंकिंग बढ़ती है।

ओवरथिंकिंग के संकेत

तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बनाने से लेकर हमेशा बुरी और नेगेटिव संभावनाओं के बारे सोचना ओवरथिंकिंग का संकेत हो सकता है।

क्या मैं ओवरथिंकिंग करता हूं?

करें सेल्फ एसेसमेंट

यहां मैं आपको एक सेल्फ एसेसमेंट टेस्ट दे रहा हूं। नीचे ग्राफिक्स में 7 सेक्शंस में कुल 21 सवाल हैं। आपको इन सवालों को ध्यान से पढ़ना है और 0 से 3 के स्केल पर इसे रेट करना है। जैसेकि पहले सवाल के लिए आपका जवाब अगर ‘कभी नहीं’ है तो 0 नंबर दें और अगर आपका जवाब ‘लगभग हमेशा’ है तो 3 नंबर दें। अंत में अपने टोटल स्कोर की एनालिसिस करें।

नंबर के हिसाब से उसका इंटरप्रिटेशन भी ग्राफिक में दिया है। अगर आपका टोटल स्कोर 0 से 12 के बीच है तो आप में ओवरथिंकिंग का मामूली पैटर्न है। लेकिन अगर आपका स्कोर 37 से 54 के बीच है तो आप में ओवरथिंकिंग का स्ट्रॉन्ग पैटर्न है। ऐसे में स्ट्रक्चर्ड थेरेपी मददगार हो सकती है।

CBT आधारित ट्रीटमेंट प्लान

ओवरथिंकिंग से बाहर निकलने का रास्ता

ओवरथिंकिंग का लक्ष्य ‘सोचना बंद करना’ नहीं है। इसका लक्ष्य है, सोचने के तरीके को बदलना ताकि व्यक्ति अपने विचारों को पहचान सके, उन्हें जांच सके और एक संतुलित सोच विकसित कर सके।

ट्रीटमेंट का मकसद

  • ऑटोमैटिक आने वाले विचारों को समझना।
  • तथ्य (फैक्ट) और व्याख्या (इंटरप्रिटेशन) में फर्क करना।
  • वैकल्पिक और संतुलित सोच विकसित करना।
  • सबसे बुरा सोचने की आदत को ब्रेक करना।

कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी (CBT) के प्रमुख स्टेप्स

1. ट्रिगर पहचानना

हर बार जब ओवरथिंकिंग शुरू हो तो खुद से तीन सवाल पूछें:

  • क्या हुआ?
  • मैंने उसका क्या मतलब निकाला?
  • मुझे कैसा महसूस हुआ?
  • इससे दिमाग ‘ऑटो-पायलट’ मोड से बाहर आता है।

2. ऑटोमैटिक थॉट पकड़ना

हवाई चिंता नहीं करनी, बल्कि एकदम ठोस वाक्य लिखना है।

जब मन कहे कि लोग तुमसे नाराज हैं तो कागज पर फैक्ट लिखें कि मैंने क्या गलत किया है।

3. अपनी सोच को लेबल देना

हर विचार के साथ उसकी गलती पहचानें। जैसे-

  • मैं दूसरे का दिमाग पढ़ रहा था। सच मुझे नहीं पता।
  • मैं इसे जबरन खुद से जोड़कर देख रहा था। इस घटना का मुझसे कोई संबंध नहीं है।

4. सबूत की जांच करना

मन में जो भी विचार आए, उसके लिए एक एविडेंस शीट बनाएं और लिखें-

  • इस विचार के पक्ष में एविडेंस
  • इस विचार के विरोध में एविडेंस

    5. संतुलित विचार बनाना

    विचार को नेगेटिव से पॉजिटिव पर नहीं ले जाना है। उसे रियलिस्टिक ही रहने देना है।

    जैसेकि-

    “सिर्फ किसी के न आने से ये साबित नहीं होता कि वह मुझसे नाराज है।”

    6. संभावना को दोबारा आंकना

    नतीजा निकालने से पहले खुद से पूछें: “ये बात सच होने की संभावना कितनी है?” इससे डर का आंकलन करने और उसे कम करने में मदद मिलती है।

    7. प्रैक्टिकल प्रयोग करना

    किसी घटना पर तुरंत निष्कर्ष न निकालें। 24 घंटे का नियम अपनाएं। 24 घंटे बाद ही नतीजे पर पहुंचें।

    8. क्लैरिफिकेशन टेस्ट

    जब किसी की बात, रिएक्शन या बिहेवियर से कोई कनफ्यूजन हो तो सीधे निष्कर्ष न निकालें। विनम्रता से पूछ लें।

    9. एविडेंस लॉग

    7 दिनों तक एक एविडेंस लॉग बनाएं और उसमें रोज नोट करें-

    • मैंने क्या सोचा।
    • असल में क्या हुआ।

    10. रूमिनेशन पर कंट्रोल

    • एक ही थिंकिंग लूप में न फंसें।
    • सोचने के लिए 10 मिनट फिक्स करें।
    • उसके बाद अपना ध्यान किसी दूसरे काम में लगाएं।

    प्रोफेशनल हेल्प कब जरूरी

    जब ब्रेन अपने प्रयासों से कंट्रोल न हो पाए और ओवरथिंकिंग का पैटर्न डिप्रेशन में बदलने लगे तो प्रोफेशनल हेल्प जरूरी है। नीचे ग्राफिक में सारे कारण देखें और इन स्थितियों में प्रोफेशनल मदद जरूर लें।

    निष्कर्ष

    जैसाकि हमने ऊपर समझा कि आपकी मुख्य समस्या है- अस्पष्ट स्थितियों को नकारात्मक अर्थ देना और उसके लिए खुद को दोषी मानना। कॉग्निटिव बिहेवियर थेरेपी का मूल मंत्र ही यही है कि हर विचार सच नहीं होता। वह आपका इंटरप्रिटेशन हो सकता है, लेकिन जरूरी नहीं कि वो फैक्ट हो। यह समझ ही ओवरथिंकिंग के चक्र को तोड़ने की कुंजी है।

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