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जीतेंद्र@84, कभी हीरोइन के स्टंट किए, फिर बने स्टार:रेखा को टाइमपास कहा, सरेआम फूट-फूटकर रोईं, महमूद ने हंसाने के लिए उतारी पैंट, जानिए किस्से

हिंदी सिनेमा के जंपिंग जैक कहे जाने वाले जीतेंद्र आज 84 साल के हो गए हैं। कभी मुंबई की चॉल में 10×12 की खोली में रहने वाले जीतेंद्र आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। मिडिल क्लास परिवार में जन्में जीतेंद्र आर्टिफिशियल जूलरी सप्लाई करने में पिता का हाथ बंटाते थे।

एक रोज वो सेट पर जूलरी पहुंचाने गए, जहां उन्हें जूनियर आर्टिस्ट का काम मिला। तनख्वाह थी 100 रुपए महीना। उस दिन जीतेंद्र का फिल्मों से ऐसा रिश्ता जुड़ा कि उन्होंने पहले जूनियर आर्टिस्ट से बतौर लीड हीरो काम किया और फिर हिंदी सिनेमा के स्टार बने। ये रिश्ता 200 से ज्यादा फिल्मों और 5 लाइफटाइम अचीवमेंट्स अवॉर्ड्स के साथ आज भी कायम है।

आज जीतेंद्र के 84वें जन्मदिन के खास मौके पर जानिए उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ मजेदार और अनसुने किस्से-

खोली में पंखा लगा, तो पूरा चॉल देखने पहुंचा

जीतेंद्र का जन्म 7 अप्रैल 1942 में अमृतसर के एक पंजाबी परिवार में हुआ। जन्म के समय उनका नाम रवि कपूर रखा गया, जो बाद में फिल्मों में आकर जीतेंद्र हुआ। जीतेंद्र कुछ महीनों के ही थे, जब परिवार मुंबई आकर बस गया और गिरगांव की श्याम सदन चॉल में रहने लगा।

जीतेंद्र के बचपन की तस्वीर।

8 लोगों का पूरा परिवार 10 बाय 12 की खोली में रहता था, जिसका भाड़ा था 6 रुपए। उनके पिता अमरनाथ फिल्मों के सेट में आर्टिफिशियल जूलरी सप्लाई करने का काम करते थे। समय के साथ जब घर की आर्थिक स्थिति सुधरने लगी तो उनके घर में ट्यूबलाइट और पंखा लगा।

चॉल में गरीबी का वो आलम था कि पूरे चॉल के लोग उनके घर वो पंखा और ट्यूबलाइट देखने पहुंचे थे। जिंदगी के 20 साल जीतेंद्र ने उसी चॉल में गुजारे। पंजाबी परिवार से होने के बावजूद आसपास के माहौल में घुल-मिलकर उन्होंने फर्राटेदार मराठी बोलना सीख लिया।

मुंबई के गिरगांव में स्थित जीतेंद्र का पुराना घर।

सेट पर जूलरी सप्लाई करते हुए बने जूनियर आर्टिस्ट

जीतेंद्र न पढ़ाई में अच्छे थे न उनके पास कोई खास टैलेंट या रुचि थी। शुरुआती पढ़ाई जैसे-तैसे पूरी की, तो पिता ने अपने आर्टिफिशियल जूलरी के बिजनेस में लगा दिया। काम था फिल्मों के सेट पर जूलरी पहुंचाना। साल 1959 में जीतेंद्र को वी.शांताराम की फिल्म नवरंग के सेट पर जूलरी पहुंचाने का काम मिला। वो रोज बस में धक्के खाते हुए सेट पर पहुंचते थे। उम्र करीब 17 साल थी।

एक रोज चकाचौंध देखकर जीतेंद्र को भी फिल्म देखने का मन किया। उन्होंने वहां खड़े लोगों से पूछा तो उन्हें साफ इनकार कर दिया गया। सबने कहा कि वी.शांताराम किसी को शूटिंग देखने की इजाजत नहीं देते। जीतेंद्र मुंह लटकाए घर पहुंचे और चाचा से शिकायत की। अगले दिन चाचा उन्हें लेकर फिर सेट पर पहुंचे और असिस्टेंट से कहा कि मेरे भतीजे को शूटिंग देखनी है। उन्होंने जवाब दिया, ‘शूटिंग देखना है, तो काम भी करना पड़ेगा।’ उन्होंने जीतेंद्र को देखा और कहा- ‘हम तुम्हें प्रिंस का रोल देंगे।’

जीतेंद्र की खुशी का ठिकाना ही नहीं रहा। रोज बस से जाने वाले जीतेंद्र अगले दिन टैक्सी में सेट पर पहुंचे। वहां पहुंचते ही उन्हें प्रिंस के कपड़े पहनाए गए, लेकिन जैसे ही वो सेट पर पहुंचे उन्हें जोरदार धक्का लगा। सेट पर वो अकेले प्रिंस नहीं थे, बल्कि वहां 200 प्रिंस बने लड़के बैठे थे। उन्हें फिल्म नवरंग के गाने तू छुपी है कहां में हीरोइन के पीछे खड़े होने वाले जूनियर आर्टिस्ट का काम मिला था।

वी.शांताराम से मांगा काम, बना दिया गया हीरोइन का बॉडी डबल

नवरंग की शूटिंग के दौरान जीतेंद्र ने खुद भी फिल्मों में काम करने का मन बना लिया। जब उन्हें 1963 में फिल्म सेहरा के सेट पर जूलरी पहुंचाने का काम मिला, तो एक दिन उन्होंने मौका पाते ही डायरेक्टर वी.शांताराम से मराठी में कहा- मुझे फिल्मों में काम करना है। वी.शांताराम ने उनकी बात से ज्यादा इस बात पर गौर किया कि एक पंजाबी कपूर साहब का लड़का इतनी अच्छी मराठी कैसे बोल रहा है। इस तरह बात चल निकली। उन्होंने जाते हुए कहा, मैं गारंटी नहीं देता, लेकिन तुम ट्राय करते रहो।

इस एक बात की बदौलत जीतेंद्र को फिल्म सेहरा में ही एक्स्ट्रा का काम मिल गया। उन्हें बस सेट पर मौजूद रहना होता था, जिससे अगर कोई जूनियर आर्टिस्ट न आए, तो वो उनकी जगह खड़े हो सकें।

इस काम के लिए जीतेंद्र को महीने के 100 रुपए तनख्वाह मिली।

वी.शांताराम और उनकी बेटी राजश्री के साथ जीतेंद्र की तस्वीर।

एक दिन फिल्म के एक सीन के लिए एक्ट्रेस संध्या को आग के ऊपर से कूदता दिखाना था। एक्ट्रेस संध्या, डायरेक्टर वी.शांताराम की पत्नी थी। उस दौर में आम तौर पर खतरनाक सीन करने के लिए एक्टर-एक्ट्रेसेस के बॉडी डबल रखे जाते थे, जो उन्हीं की तरह तैयार होकर खतरनाक स्टंट करते थे। उस दिन भी सेट पर एक बॉडी डबल बुलाई गई थी, लेकिन आग देखकर उसने सीन करने से इनकार कर दिया।

इसके लिए एक्ट्रेस की बॉडी डबल बनने के लिए एक लड़की बुलाई गई थी। आग की लपटें देख वो लड़की डर गई और वहां से चली गई। सेट पर मौजूद जब कोई लड़की वो सीन करने के लिए राजी नहीं हुई तो वी.शांताराम ने जीतेंद्र को ही ये काम दे दिया। जीतेंद्र को एक्ट्रेस संध्या की तरह तैयार किया गया, जिसके बाद उन्होंने हीरोइन बनकर सीन किया।

पहला डायलॉग ही नहीं बोल पाए जीतेंद्र, चिढ़ गए फिल्म के डायरेक्टर

इस एक रोल से जीतेंद्र, वी.शांताराम के दिल में घर कर गए। उन्हें इस फिल्म में एक डायलॉग भी दिया गया। उन्होंने कहना था, सरदार, दुश्मनों का दल टिड्डियों की तरह आगे बढ़ रहा है। 25 रीटेक के बावजूद जीतेंद्र डायलॉग ठीक तरह नहीं बोल पाए। खीझकर वी.शांताराम ने वो गलत डायलॉग ही फिल्म में फाइनल कर लिया।

वो वी.शांताराम ही थे, जिन्होंने जीतेंद्र का हुनर परखा और उन्हें फिल्म गीत गाया पत्थरों ने में लीड रोल दिया।

पहली फिल्म देखने पेरेंट्स के साथ पहुंचे, खाली पड़ा था थिएटर

जीतेंद्र की बतौर हीरो पहली फिल्म गीत गाया पत्थरों ने साल 1964 में रिलीज हुई। चॉल में रहने वाले जीतेंद्र के लिए ये खास दिन था। उन्होंने चॉल के पास स्थित एक थिएटर में पिता अमरनाथ और मां कृष्णा को फिल्म दिखाने के लिए तीन टिकटें खरीदीं। थिएटर पहुंचते ही उन्होंने टिकट देखने के लिए गेट पर खड़े शख्स से पूछा, हमें कहां बैठना है। जवाब मिला, पूरा थिएटर खाली है, जहां बैठना है बैठ जाओ। ये फिल्म खास नहीं चली, लेकिन जीतेंद्र ने ठान लिया कि अब वो फिल्मों में ही करियर बनाएंगे।

लड़की को लाइन मारने के चक्कर में दोस्त को फंसाया

जीतेंद्र पहली फिल्म फ्लॉप होने के बाद प्रोड्यूसर्स के दफ्तरों के चक्कर काटते हुए फिल्में मांगा करते थे। वो संघर्ष के दिनों में कोलाबा की ऊषा सदन बिल्डिंग में रहने पहुंचे, जहां एक्टर प्रेम चोपड़ा भी रहा करते थे। उस दौर में प्रेम चोपड़ा नौकरी भी करते थे और फिल्मों में काम की तलाश में थे।

फिल्मों में छोटा-मोटा काम करते हुए जीतेंद्र ने कार खरीद ली थी, प्रेम चोपड़ा के पास भी कार हुआ करती थी। दोनों एक ही समय पर घर से निकलते और प्रोड्यूसर्स के दफ्तरों के बाहर टकराते रहते थे। लेकिन एक-दूसरे के सामने खुद को रईस और व्यस्त दिखाते थे।

एक रोज प्रेम चोपड़ा ने जीतेंद्र से पूछ ही लिया, हम दोनों एक साथ निकलते हैं, एक ही जगह जाते हैं, क्यों न हम ये दिखावा छोड़कर एक ही गाड़ी से आएं-जाएं, इससे पैसे भी बच जाएंगे। तंगी में गुजारा कर रहे जीतेंद्र भी झट से मान गए।

तब से दोनों साथ घरों से निकलते लगे। तय हुआ कि एक दिन का खर्च एक शख्स उठाएगा और दूसरे दिन दूसरा शख्स खर्च करेगा।

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