मध्य प्रदेश

मध्य प्रदेश की नगर पालिका और नगर परिषदों के अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार शून्य घोषित होने का खतरा;पार्षदों से चुने गए 2 अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार शून्य; सरकार ने नहीं किया था नोटिफिकेशन

मध्य प्रदेश की नगर पालिका और नगर परिषदों के अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार शून्य घोषित होने का खतरा है। ये अध्यक्ष वर्ष 2022 और उसके बाद हुए चुनाव के बाद चुने गए थे और सरकार ने इनके निर्वाचन का नोटिफिकेशन नहीं किया था।

अब तक 2 निकाय श्योपुर और पानसेमल के अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार शून्य घोषित कर दिए हैं। डबरा का मामला कोर्ट में है। हाईकोर्ट पहुंचे इन मामलों में सुनवाई के बाद कोर्ट ने ऐसे अध्यक्षों को विधिवत निर्वाचित नहीं माना है और इनके वित्तीय अधिकार सीएमओ या एसडीएम को सौंपने के आदेश दिए हैं।

आगे डबरा नगर पालिका समेत प्रदेश की 98 नगर पालिका और 297 नगर परिषद अध्यक्षों की कुर्सी पर खतरा मंडरा रहा है। कानून के जानकारों के मुताबिक जैसे-जैसे शिकायतें होगी, इनके अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार शून्य घोषित होते जाएंगे। बता दें, प्रदेश में कुल 99 नगर पालिका और 298 नगर परिषद हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद तत्कालीन शिवराज सरकार में पार्षदों से अध्यक्ष चुन लिए गए।

इसलिए शून्य घोषित किए वित्तीय अधिकार

दरअसल, तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में निकाय चुनाव में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर राज्य निर्वाचन आयोग ने नगर निकाय और पंचायत चुनाव आनन-फानन करा दिए थे।

तब नगर निगमों के चुनाव तो सीधे जनता से कराए गए थे, लेकिन नगर पालिका और नगर परिषद अध्यक्षों को जनता के बजाय पार्षदों से चुन लिया गया। खास यह है कि चुनाव के बाद नगर निगम, नगर पालिका और नगर परिषद के महापौर और पार्षद का बकायदा नोटिफिकेशन कर जीत-हार का ऐलान किया गया था।

जबकि नगर पालिका और नगर परिषद के पार्षदों से चुने गए अध्यक्षों का नोटिफिकेशन राज्य सरकार के नगरीय विकास और आवास विभाग ने नहीं किया था।

इंदौर जिले के पानसेमल अध्यक्ष पद से हुआ खुलासा

हाईकोर्ट के अधिवक्ता ब्रह्ममूर्ति तिवारी बताते हैं कि नगर परिषद और नगर पालिका अध्यक्षों के वित्तीय अधिकार शून्य किए जाने की शुरुआत इंदौर की पानसेमल नगर परिषद के अध्यक्ष पद के विवाद से शुरू हुई।

यहां के अध्यक्ष के खिलाफ विरोधी पार्षद ने जिला न्यायालय के एडीजे कोर्ट में शिकायत की थी। कोर्ट ने सरकार से जानकारी मांगी तो सरकार सही जवाब नहीं दे पाई। इस पर एडीजे कोर्ट ने आदेश दिया कि नगर परिषद अध्यक्ष के वित्तीय अधिकार शासन का नोटिफिकेशन नहीं होने से मौजूद नहीं हैं।

इसके विरोध में हाईकोर्ट में अपील की गई तो वहां से भी नगरीय विकास विभाग से जवाब मांगा गया। जवाब नहीं दिया गया, क्योंकि सरकार

श्योपुर नगर पालिका अध्यक्ष को काम करने से रोका

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने श्योपुर नगर पालिका अध्यक्ष से जुड़े मामले में राज्य सरकार की रिट अपील को खारिज करने का आदेश न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र यादव की डिवीजन बेंच ने सुनाया है। यह प्रकरण श्योपुर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष पद के चुनाव से जुड़ा है।

इस पद के चुनाव को चुनौती देते हुए एक व्यक्ति सुमेर सिंह ने जिला न्यायालय में चुनाव याचिका दायर की थी। सुनवाई के दौरान सिंगल बेंच ने अंतरिम आदेश देते हुए नगर पालिका अध्यक्ष रेणु गर्ग को अध्यक्ष के रूप में कार्य करने से रोक दिया था।

इस आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में रिट अपील दायर की थी। राज्य की ओर से दलील दी गई कि सिंगल जज का दिया आदेश गलत है। अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए राजपत्र (गजट) में अलग से अधिसूचना जरूरी नहीं है।

वहीं, याचिकाकर्ता पक्ष ने तर्क दिया कि बिना गजट अधिसूचना के किसी उम्मीदवार को निर्वाचित घोषित नहीं किया जा सकता और ऐसे में अध्यक्ष के रूप में कार्य करना नियमों के विपरीत है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कहा कि सिविल रिवीजन में दिए गए अंतरिम आदेश के खिलाफ रिट अपील नहीं की

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