कानपुर में बिना परीक्षा दिए मार्कशीट और डिग्रियां दिलाने वाला सिंडिकेट पकड़ा गया;फर्जी डिग्री से कमाई का 60% कमीशन यूनिवर्सिटी ले रहीं

कानपुर में बिना परीक्षा दिए मार्कशीट और डिग्रियां दिलाने वाला सिंडिकेट पकड़ा गया। मास्टर माइंड मैथ टीचर शैलेंद्र से पुलिस ने बंद कमरे में पूछताछ की।
जो कुछ सामने आया, वो बेहद चौंकाने वाला था। बीटेक, बी. फार्मा, एलएलबी की डिग्रियां दिलाने वाला सिंडिकेट सिर्फ 40% कमीशन पर काम करता था। फर्जी डिग्रियों से कमाई का 60% विश्वविद्यालयों के क्लर्क और कर्मचारियों के पास जाता था।
इस सिंडिकेट के सरगना शैलेंद्र ने एडमिशन एजेंट की तरह काम शुरू किया था, मगर धीरे-धीरे कई विश्वविद्यालयों के क्लर्क और कर्मचारी उसके संपर्क में आ गए।
इसके बाद वह फर्जी मार्कशीट और डिग्री बनाने लगा। इस तरह ये सिंडिकेट 9 राज्यों की 14 यूनिवर्सिटी तक पहुंच गया। पुलिस को छापेमारी में इन यूनिवर्सिटी की 900 से ज्यादा फर्जी मार्कशीट और डिग्रियां मिली थीं। अब पुलिस इन यूनिवर्सिटी के क्लर्क और कर्मचारियों को ट्रेस कर रही है।

राजदूत बनकर कई देशों के राष्ट्रपति से मिला मनीष DCP साउथ दीपेंद्र नाथ चौधरी ने बताया- सिंडिकेट का फरार मेंबर मनीष उर्फ रवि बहुत ही शातिर है, वह खुद को भारत राजदूत बताकर 4 देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक से मिल चुका है।
सिंडिकेट 3 तरह से काम करता उन्होंने बताया कि पूछताछ में सामने आया कि आरोपी 3 तरह से काम करते थे।
- पहला- बैक डेट में मार्कशीट तैयार कराना।
- दूसरा- करंट डेट में कॉलेज में दाखिला कराना, बाकायदा पूरा कोर्स कराने का ठेका लेना, जिसमें गिरोह के मेंबर मनचाहे कॉलेज में एडमिशन कराते, महीने की फीस वसूलते और घर बैठे डिग्री मुहैया करा देते थे।
- तीसरा तरीका- फर्जी मार्कशीट उपलब्ध कराना था।
अब जानिए कैसे शैलेंद्र ने नेटवर्क बढ़ाया…
कोचिंग पढ़ाते हुए यूनिवर्सिटी कर्मचारियों के संपर्क में आया इस जांच में शामिल किदवई नगर इंस्पेक्टर धर्मेंद्र कुमार राम ने बताया- शैलेंद्र 2010 में काकादेव में मैथ की कोचिंग पढ़ाने आया था। इस दौरान शैलेंद्र कई प्राइवेट यूनिवर्सिटी के संपर्क में आ गया। उनके लिए वह बतौर एजेंट काम करने लगा।
वह बीटेक, एमटेक, बीफार्मा, डीफार्मा समेत अलग-अलग कोर्स सस्ते दामों में दाखिला कराने लगा और उसके एवज में मोटा कमीशन वसूलने लगा था। इस दौरान वह छतरपुर में रहने वाले आरोपी मयंक भारद्वाज, हैदराबाद के मनीष उर्फ रवि, गाजियाबाद के विनीत, भोपाल के शेखू उर्फ ताबिश, नागेंद्र, जोगेंद्र और अश्वनी के संपर्क में आया।
सिंडिकेट से जुड़े हर एजेंट का था अलग-अलग डिपार्टमेंट इसके बाद शैलेंद्र ने इन सब के साथ मिलकर 2012 से अपना सिंडिकेट शुरू किया, फिर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इंस्पेक्टर ने बताया, सिंडिकेट से जुड़े सभी मेंबरों के बाकायदा डिपार्टमेंट तय किए गए थे। हर कोर्स और विश्वविद्यालय के लिए अलग-अलग मेंबर थे, जिनको फर्जी डिग्री, मार्कशीट मुहैया कराने की जिम्मेदारी थी।
- अश्वनी – मेडिकल की डिग्रियां तैयार करता था।
- नागेंद्र – बीकॉम, बीएससी, एमएससी, एमबीए की मार्कशीट बनाता था।
- जोगेंद्र और रवि – एलएलबी, हाईस्कूल और इंटर की मार्कशीट और डिग्री बनाते थे।
- मयंक भारद्वाज – अलीगढ़ स्थित मंगलायतन यूनिवर्सिटी का काम देखता था।
- मनीष उर्फ रवि – फरीदाबाद स्थित लिंग्या यूनिवर्सिटी के टच में रहता था।
- विनीत – हापुड़ स्थित मोनाड यूनिवर्सिटी का काम देखता था।
- शुभम दुबे और गौतम – छतरपुर की श्रीकृष्ण विश्वविद्यालय का काम देखता था।
- सेखू उर्फ ताबिश – मणिपुर स्थित एशियन यूनिवर्सिटी से डिग्रियां और मार्कशीट उपलब्ध कराना था।
- विनीत – मंगलायतन यूनिवर्सिटी के संपर्क में रहता था।
- नागेंद्र – ईटानगर स्थित हिमालयन यूनिवर्सिटी की डिग्रियां उपलब्ध कराने का काम करता था।
लिंग्या यूनवर्सिटी की सभी डिग्रियां फर्जी मिली DCP साउथ के मुताबिक सिंडिकेट के मेंबरों ने सबसे ज्यादा एलएलबी, बीफार्मा और डीफार्मा की डिग्रियां मिली हैं। इसके साथ ही सीएसजेएमयू की 100 माइग्रेशन सर्टिफिकेट की बुकलेट मिली, जिसमें से 80 सर्टिफिकेट लोगों को बांटे जा चुके हैं।
सिंडिकेट के शैलेंद्र ने पुलिस को बताया- वह 2 से 3 दिन के अंदर किसी भी तरह की डिग्रियां लोगों को मुहैया करा देते थे, हर डिग्री मार्कशीट में उन्हें तय की गई रकम से 40% मिलता था, जबकि उसका 60% हिस्सा विभिन्न यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों को जाता था।
उन्होंने बताया कि फरीदाबाद स्थित लिंग्या विश्वविद्यालय से 100 मा



