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परवरिश:बच्चा जिद्दी क्यों हो रहा है, कहीं इसकी वजह आप माता-पिता के अलग-अलग नियम तो नहीं?

ये इकलौता वाकया नहीं है। अधिकांश माता-पिता ये भूल करते हैं। समझिए पैरेंटिंग एक टीमवर्क है। यदि टीम एकमत न हो, तो बच्चे का मन भी उलझन का मैदान बन जाता है। और ये मतभेद बच्चे पर क्या असर दिखाता है और इसके समाधान क्या हो सकते हैं ये हमारी विशेषज्ञ डॉ. पवित्रा शंकर, एसोसिएट कंसल्टेंट, साइकियाट्री, आकाश हेल्थकेयर से जानिए…

मतभेदों का पड़ता है गहरा असर

1- अगर मां कहती हैं, ‘आज चॉकलेट नहीं खाना,’ और पिता कहें, ‘खा लेने दो’ तो बच्चे के मन में यह संदेश जाता है कि मम्मी सख़्त हैं और पापा अच्छे। धीरे-धीरे वह मां की बात को अनदेखा करने लगता है।

मानसिक असर… बच्चा अनुशासन को ‘सज़ा’ और छूट को ‘इनाम’ समझने लगता है।

2- मां बात-बात पर कहती हैं कि पिता को आने दो, शिकायत करूंगी। और जब पिता डांटते हैं तो कहती हैं, ‘अरे, बस-बस अब मत डांटो।’ ऐसे में बच्चा डांट से सीखने के बजाय ‘बचाव’ को अधिकार समझने लगता है।

मानसिक असर… बच्चे में जवाबदेही की भावना घटती है, और वह अपनी ग़लती स्वीकारने से बचता है।

3- जब एक बहुत सख़्त और दूसरा बहुत नर्म हो यानी एक अभिभावक अनुशासनप्रिय है और दूसरा लापरवाही दिखाए। जैसे- मां कहती हैं कि किसी फोन पर गेम नहीं खेलना और पिता अपना फोन बच्चे को दे देते हों तो इससे बच्चा सही और ग़लत का संतुलन खो देता है।

मानसिक असर… बच्चा ‘दोहरी ज़िंदगी’ जीने लगता है, एक के सामने आज्ञाकारी और दूसरे के सामने मनमौजी।

4- अगर मां बच्चे की ग़लती छिपा लेती हैं और वह पिता को न बताने को कहती हैं, ताकि डांट न पड़े तो बच्चे को लगता है कि सच बोलना ज़रूरी नहीं है।

मानसिक असर… बच्चा झूठ बोलने या नियम तोड़ने को सामान्य मान लेता है।

5- अगर माता-पिता में कोई एक हर बात पर रोक लगाता है और दूसरा हर बार अनुमति देता है, तो बच्चा सीखता है कि उसे किसी न किसी से तो मंज़ूरी मिल ही जाएगी।

मानसिक असर… सीमाओं की समझ ख़त्म होती है और आत्मनियंत्रण कमज़ोर होता है।

आपकी आदतें भी हैं असरदार

  • हम अक्सर बच्चों को अच्छा नागरिक बनाने में लगे रहते हैं, जबकि ध्यान ख़ुद पर भी देना ज़रूरी है। क्योंकि बच्चा सबसे ज़्यादा आपको देखकर, समझकर ही सीखता है। इसलिए ये कुछ ग़लतियां सुधारिए जो अक्सर माता-पिता करते हैं जिनसे बच्चा दुविधा में पड़ जाता है।
  • बच्चे को गाली देने रोकना जबकि पिता ग़ुस्से में या फोन पर गाली देते हों।
  • ग़ैरज़रूरी चीज़ें न ख़रीदने को कहना जबकि मां मनमानी शॉपिंग करती हों।
  • मां का व्यवस्था बनाए रखने को कहना जबकि पिता ख़ुद चीज़ें कभी जगह पर नहीं रखते।
  • फोन का अधिक उपयोग करने पर मना करना जबकि आप ख़ुद खाते हुए या फिर काम करते हुए फोन का इस्तेमाल करते हों।
  • दूसरों के साथ मान से पेश आना, जबकि ख़ुद बच्चों के सामने दूसरों की बुराई करते हों।

एकमत होना क्यों आवश्यक है?

  • माता-पिता का समान रवैया बच्चे को मानसिक स्थिरता प्रदान करता है व अनुशासन स्वाभाविक रूप से विकसित होता है।
  • बच्चे को नियमों की एकरूपता समझ आती है।
  • बच्चा वही बनता है जो अपने घर में देखता है। अगर माता-पिता एक-दूसरे की राय का सम्मान करें, तो बच्चा भी दूसरों की भावनाओं की क़द्र करना सीखता है।

समझदारी का आईना ऐसे देखें

  • अक्सर माता-पिता के बीच किसी बात को लेकर असहमति होना स्वाभाविक है। लेकिन किसी भी बात पर असहमति हो तो बच्चे के सामने बहस न करें। इसके बजाय मतभेदों पर बाद में अकेले में और शांत माहौल में चर्चा करें।
  • बच्चे को स्पष्टता देने के लिए नियमों का एक जैसा होना ज़रूरी है। जैसे- स्क्रीन टाइम, मोबाइल का उपयोग, पौष्टिक खान-पान, घर में मदद और सोने-जागने के नियम माता-पिता दोनों मिलकर पहले से तय कर लें। जब नियम दोनों की तरफ से एक समान होते हैं, तो बच्चा उनका पालन गंभीरता से करता है।
  • अभिभावक होना कोई मुकाबला नहीं है। दोनों की भूमिकाएं अलग-अलग हो सकती हैं, पर बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए दोनों का योगदान समान रूप से महत्वपूर्ण है।
  • बच्चे आपके शब्दों से ज़्यादा आपके लहजे को समझते हैं। इसलिए बच्चे को किसी चीज़ के लिए मना करते समय भी संवेदनशील और सकारात्मक शब्दों का चयन करें। जब आप संयमित भाषा का उपयोग करते हैं, तो बच्चा भी उसी व्यवहार को अपनाता है।
  • अनुशासन के मामले में विरोधाभास बच्चे को ज़िद्दी बना सकता है। इसलिए ऐसा कभी न हो कि एक अभिभावक बच्चे को ग़लती पर सज़ा दे व दूसरा तुरंत उसे इनाम देकर या लाड़ दिखाकर बचा ले।

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