‘गोरा-बादल’ कविता के रचनाकार पं. नरेंद्र मिश्र का निधन:वंदेमातरम पर लिखी आखिरी 4 पंक्तियां; साहित्य जगत में शोक की लहर


दोहराता हूं सुनो रक्त से लिखी हुई कुर्बानी जिसके कारण मिट्टी भी चंदन है राजस्थानी
ये पंक्तियां कालजयी रचना गोरा-बादल की शुरुआत हैं। इन शब्दों के रचनाकार, राष्ट्रीय स्तर के वीर रस के कवि और लाल किले से 18 बार मेवाड़ का प्रतिनिधित्व करने वाले कवि पंडित नरेंद्र मिश्र का मंगलवार को निधन हो गया।
वे 88 साल के थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। मंगलवार सुबह अचानक उनकी तबीयत खराब हो गई।
परिजन उन्हें चित्तौड़गढ़ के एक निजी हॉस्पिटल लेकर पहुंचे। जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। उनके निधन की खबर फैलते ही साहित्य जगत, शिक्षा क्षेत्र और सामाजिक सरोकारों से जुड़े लोगों में गहरा शोक छा गया।
1976 में मेवाड़ के तत्कालीन पूर्व महाराणा भगवत सिंह ने उनकी प्रसिद्ध कविता ‘गोरा-बादल’ सुनकर ‘मेवाड़ राजवंश के राजकवि’ की उपाधि दी थी। यह उनके साहित्यिक जीवन का सबसे बड़ा सम्मान माना जाता है।

2 दिन पहले वंदेमातरम पर लिखी 4 पंक्तियां साबित हुईं आखिरी रचना
वंदेमातरम को लेकर देश में चल रही बहस के बीच दो दिन पहले ही पं. मिश्र ने वंदेमातरम को लेकर चार पंक्तियां लिखी थीं। उन्होंने लिखा-
आस्था की अस्मिता की शान वंदेमातरम…भरत भू की आन की पहचान वंदेमातरम… जो तिरंगे के लिए सिर पर कफन बांधे रहे… उन अमर शहीदों का बलिदान वंदेमातरम…

मेवाड़ से लगाव था इसलिए 10वीं क्लास में लिख दी गोरा बादल की कविता
पंडित नरेंद्र मिश्र का जन्म 5 मई 1937 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के ठाकुरद्वारा गांव में मुरारीलाल मिश्र के घर हुआ था।
गंगा किनारे पले-बढ़े पंडित मिश्र बचपन से ही राष्ट्रभक्ति, इतिहास और वीरता की कहानियों के प्रति आकर्षित थे।
मेवाड़ के शौर्य की कथाओं ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि स्कूल में 10वीं कक्षा में पढ़ते हुए उन्होंने ‘गोरा-बादल’ जैसी महान ऐतिहासिक कविता की रचना कर दी।
मेवाड़ के इतिहास, संस्कृति और मातृत्व शक्ति के प्रति उनके इस गहरे भाव ने ही उन्हें आगे चलकर राजस्थान की धरती तक खींच लाया।

टीचर से करियर की शुरुआत, उपजिला शिक्षा अधिकारी के रूप में रिटायरमेंट
पंडित मिश्र ने अपना करियर एक टीचर के रूप में शुरू किया। सबसे पहले वे छोटी सादड़ी में शिक्षक बने। इसके बाद अरनोद गांव में भी पढ़ाया।
कुछ साल बाद वे चित्तौड़गढ़ आ गए और अपनी मेहनत, सादगी और ईमानदारी के कारण शिक्षा विभाग में सम्मानित अधिकारी बने। वे उपजिला शिक्षा अधिकारी के पद से रिटायर्ड हुए।
वर्ष 1997 में उनकी पत्नी सरोज मिश्र का निधन हो गया। इससे उनका परिवार गहरे दुख में डूब गया था। उनके दो बेटे विवेक और विश्वास, तीन बेटियां श्रद्धा, डॉ. निरूपमा और अनामिका हैं।
काव्य रचनाएं और मेवाड़ का गौरव बढ़ाने वाला साहित्य आज भी है जीवंत
पंडित मिश्र की कविताएं मेवाड़ के इतिहास की आत्मा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम बनी।
‘हल्दीघाटी’, ‘गोरा-बादल’, ‘पद्मिनी’, ‘हुमायूं की राखी’, ‘जौहर की ज्वाला अविनाशी’, ‘पन्नाधाय’, ‘हाड़ी रानी’ और महाराणा प्रताप पर उनकी रचनाएं आज भी लोगों के मन में बसे हुई हैं।
मां पद्मिनी के त्याग और गोरा-बादल की वीरता को उन्होंने अपनी कविता में जिस तरह जीवंत किया, वह मेवाड़ के साहित्य में अमर हो गया।
उनकी कई पंक्तियां चित्तौड़गढ़ शहर, उदयपुर के मोती मगरी, डबोक एयरपोर्ट और नई दिल्ली के पुराने संसद भवन पर भी अंकित हैं, जो उनके साहित्यिक प्रभाव का प्रमाण हैं।
उन्होंने मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी, महाराणा प्रताप एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी और माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान के कुलगीत भी लिखे, जिन्हें आज तक गायन परंपरा में शामिल किया जाता है।
कविता मंचों की मर्यादा और उनकी सोच
पंडित मिश्र मंचीय कविता के बड़े और संस्कारी कवि माने जाते थे। वे हमेशा कहा करते थे-“जो कविता मैं अपने घर की बहन-बेटियों के सामने नहीं सुना सकता, वह देश की बहन-बेटियों के सामने भी नहीं सुना सकता।”
उनकी यह सोच उन्हें अन्य कवियों से अलग पहचान देती थी। वे स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर दिल्ली के लाल किले पर आयोजित होने वाले राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों में 18 बार राजस्थान का प्रतिनिधित्व कर चुके थे।
उनकी वाणी और संस्कृति से जुड़े विषयों ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय किया।

सम्मान, पुरस्कार और विशेष उपलब्धियां
पंडित नरेंद्र मिश्र को साहित्य सेवा के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। इनमें महाराणा कुम्भा सम्मान, निराला सम्मान, तांत्या टोपे सम्मान, दीन दयाल उपाध्याय साहित्य पुरस्कार और राजस्थान साहित्य अकादमी द्वारा दो बार विशिष्ट साहित्यकार सम्मान प्रमुख हैं।
जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ ने उन्हें समाज विभूति सम्मान दिया, जबकि मोहनलाल सुखाड़िया यूनिवर्सिटी ने उन्हें स्वर्ण जयंती सम्मान से नवाजा। विशेष बात यह रही कि उन्हें ये सम्मान बिना किसी आवेदन के स्वयं मिले, क्योंकि उनके साहित्य की चमक ही उनका परिचय थी।
वे लंबे समय तक महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन, उदयपुर के जूरी सदस्य भी रहे।
काफी समय से वे घर पर ही बीमार चल रहे थे। तीन साल पहले कवि कुमार विश्वास उनसे मिलने आए थे, और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी दो बार उनकी कुशलक्षेम पूछ चुके थे।



