मध्य प्रदेश

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में जिन डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटे:भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग के अलग-अलग सिस्टम से बनी स्थिति, जानिए कैसे

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) में जिन डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटे हैं, वे अगले साल के नगर निगम और पंचायत चुनावों में फिर भी वोट डाल सकते हैं। इसकी वजह भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) के बीच मतदाता सूची को लेकर विवाद है। इससे एक आयोग की तरफ से हटाया गया मतदाता दूसरे आयोग की सूची में शामिल हो सकता है।

दरअसल, राज्य निर्वाचन आयोग ने SIR के बाद तैयार नई वोटर लिस्ट मांगी थी, ताकि 15 जिलों के निकाय उपचुनाव और अगले साल के पंचायत व नगरीय चुनाव उसी आधार पर कराए जा सकें। राज्य आयोग ने पांच बार पत्र भेजे, लेकिन केंद्रीय आयोग ने सूची उपलब्ध नहीं कराई। इसके बाद राज्य निर्वाचन आयोग ने अलग वोटर लिस्ट तैयार करने की प्रक्रिया शुरू की।

  1. दोनों संवैधानिक संस्थाओं की वोटर लिस्ट अलग-अलग क्यों होती है?
  2. वोटर लिस्ट साझा न करने का विवाद क्या पहली बार हुआ है?
  3. ECI ने SEC के साथ मतदाता सूची साझा क्यों नहीं की?
  4. पश्चिम बंगाल का वोटर लिस्ट विवाद मप्र से अलग कैसे है?
  5. SIR में नाम कटने वाले निकाय चुनाव में वोट कैसे डाल सकेंगे?
  6. अगर निकाय और विधानसभा चुनावों की वोटर लिस्ट अलग होगी, तो SIR का औचित्य क्या रह जाएगा?

आइए, इन सवालों के जवाब सिलसिलेवार समझते हैं…

1. ECI और SEC की वोटर लिस्ट अलग-अलग क्यों होती है?

भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का गठन संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत हुआ है। यह लोकसभा, राज्यसभा, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और विधानसभा चुनाव कराता है तथा इनके लिए मतदाता सूची तैयार करता है। वहीं राज्य निर्वाचन आयोग (SEC) नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव कराता है और उसके लिए अलग वोटर लिस्ट बनाता है। दोनों संस्थाओं का उद्देश्य निष्पक्ष चुनाव कराना है।

2. क्या वोटर लिस्ट को लेकर यह विवाद पहली बार सामने आया है?

रिटायर्ड अधिकारी आरआर बंसल के मुताबिक ऐसा विवाद पहली बार सामने आया है। SEC हर साल वोटर लिस्ट अपडेट करने के लिए ECI से सूची मांगता रहा है। ECI जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर में विधानसभा वार वोटर लिस्ट अपडेट करता है। इसी सूची के आधार पर SEC निकाय चुनावों की सूची तैयार करता है।

इसमें वार्ड संबंधी जानकारी होने से संशोधन आसान होता है। सूची जारी होने के बाद दावे-आपत्तियां मंगाई जाती हैं और मृतकों के नाम हटाने या नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया होती है। नियमों के मुताबिक ECI को 60 दिनों के भीतर सूची उपलब्ध करानी होती है।

3. ECI ने SEC को मतदाता सूची क्यों नहीं दी?

संयुक्त मुख्य राज्य निर्वाचन पदाधिकारी आरपी सिंह जादौन के मुताबिक SEC ने पुनरीक्षण के लिए वोटर लिस्ट मांगी थी, लेकिन ECI ने कहा कि वह रिवीजन प्रक्रिया के लिए सूची साझा नहीं करता। अधिकारियों के अनुसार यह फैसला केंद्रीय आयोग का था। विशेषज्ञ मानते हैं कि SIR के बाद संभावित विसंगतियों के कारण सूची साझा नहीं की गई होगी।

4. पश्चिम बंगाल का वोटर लिस्ट विवाद अलग कैसे है? पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले SIR के दौरान करीब 90 लाख वोटर्स के नाम हटाए गए थे। चुनाव आयोग ने इनमें कई लोगों को अनुपस्थित, मृत, दूसरे स्थान पर स्थानांतरित या डुप्लीकेट बताया था। तत्कालीन टीएमसी सरकार ने आरोप लगाया था कि वैध मतदाताओं के नाम भी हटाए गए ताकि केंद्र की एनडीए सरकार को चुनावी फायदा मिल सके।

वहां विवाद राजनीतिक टकराव से जुड़ा था, क्योंकि केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें थीं। जबकि मप्र में केंद्र और राज्य दोनों में बीजेपी की सरकार है। यहां विवाद दोनों आयोगों के बीच तालमेल की कमी को लेकर है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button