18 साल की गायकी में नाम नहीं बना पाईं, धुरंधर से मिली पहचान;सिंगर जैस्मीन सैंडलस की जिंदगी सफलता के साथ संघर्ष और दर्द से भरी रही

‘धुरंधर’ से बड़ी पहचान बनाने वाली सिंगर जैस्मीन सैंडलस की जिंदगी सफलता के साथ संघर्ष और दर्द से भरी रही है। एक वक्त वह अंदर से टूट गई थीं और शराब की लत में फंस गई थीं। आज वह उस दौर पर पछताती हैं।
माता-पिता ने बेहतर भविष्य के लिए सबकुछ छोड़ दिया। अमेरिका चले गए। पिता भारत में अच्छी नौकरी छोड़कर अमेरिका में पेट्रोल पंप पर काम करने लगे, जबकि मां फैक्ट्री में मजदूरी करती थीं। शुरुआती साल बेहद कठिन रहे। परिवार ने गरीबी में दिन गुजारे।
इन हालात के बावजूद जैस्मीन ने म्यूजिक का साथ नहीं छोड़ा। ‘किक’ के गाने ‘यार ना मिले’ से उन्हें पहचान मिली, लेकिन ‘धुरंधर’ के गानों ने उन्हें नई ऊंचाई तक पहुंचाया।
आज की सक्सेस स्टोरी में जानिए जैस्मीन सैंडलस के करियर और निजी जीवन से जुड़ी बातें…

गायिकी की प्रेरणा मां से मिली
जैस्मीन सैंडलस का जन्म 4 सितंबर 1985 को पंजाब के जालंधर में हुआ। वह साधारण पंजाबी परिवार से हैं। बचपन से उन्हें मां से गायिकी की प्रेरणा मिली, जो उन्हें गाने के लिए प्रोत्साहित करती थीं। स्कूल के दिनों से उन्होंने स्टेज पर गाना शुरू किया और गाने लिखने लगी थीं।
अमेरिका का सफर: बेहतर भविष्य की तलाश
करीब 12 साल की उम्र में उनका परिवार कैलिफोर्निया शिफ्ट हो गया। शुरुआती समय में वे न्यूयॉर्क भी रहीं। उन्हें इंग्लिश नहीं आती थी, इसलिए लोकल स्कूल में एडमिशन लेना पड़ा। उनके पिता भारत में हाई-प्रोफाइल नौकरी में थे और लॉ स्कूल टॉपर थे, लेकिन बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए सबकुछ छोड़ दिया।
अमेरिका में संघर्ष: गरीबी, छोटे काम और मुश्किल हालात
अमेरिका में परिवार ने मुश्किल हालात देखे। छह लोगों का परिवार एक छोटे कमरे में रहता था और फूड कूपन पर निर्भर था। पिता को छोटे काम करने पड़े, यहां तक कि पेट्रोल पंप पर भी काम किया। मां फैक्ट्री में मजदूरी करती थीं और चेरी तोड़ती थीं।

पढ़ाई और म्यूजिक की ओर झुकाव
जैस्मीन ने अमेरिका में पढ़ाई पूरी की। उन्होंने साइकोलॉजी में ग्रेजुएशन और प्री-लॉ की पढ़ाई की, लेकिन मन हमेशा म्यूजिक में रहा।
जैस्मीन सैंडलस ने रणवीर अल्लाहबादिया के पॉडकास्ट में कहा- हम न्यूयॉर्क पहुंचे। मुझे इंग्लिश नहीं आती थी। जो भी लोकल स्कूल था, पापा ने हमें वहीं एडमिशन दिला दिया। हम एक छोटे अपार्टमेंट में रहते थे, जो गरीब परिवार के लिए था।
पापा ने पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी
मेरे पापा इंडिया में हाई प्रोफाइल जॉब करते थे। वह लॉ स्कूल टॉपर थे, लेकिन अमेरिका जाने पर 3-4 साल पढ़ाई या नौकरी करनी पड़ती है। इसलिए पापा ने हमारे लिए अपनी पूरी जिंदगी कुर्बान कर दी। अमेरिका में उनकी पहली नौकरी पेट्रोल पंप पर थी, जहां वह पेट्रोल भरते थे। वह बर्फ में बैठे थे और पैरों में जूते नहीं थे। पूछने पर उन्होंने कहा कि बर्फ के जूते बहुत महंगे हैं।
फूड कूपन से चलती थी जिंदगी
हम उन घरों में रहते थे, जो गरीबी रेखा वालों के लिए होते हैं, इसलिए फूड कूपन मिलते थे। मेरी मां फैक्ट्री में काम करती थीं और चेरी तोड़ती थीं। वह वहां मजदूर के रूप में काम करती थीं।
जब हम कैलिफोर्निया गए, तो मेरे पिता ने फिर से कानूनी पेशे में एंट्री की और इंटरप्रेटर बन गए। इसके बाद हमारी आर्थिक स्थिति बेहतर हो गई।
रिश्तों में दरार, पिता का निधन और टूटता मन
जैस्मीन ने माना कि उनके और माता-पिता के रिश्ते आसान नहीं रहे। वह कहती हैं- मेरे और परिवार के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। बहुत कुछ अंदर ही अंदर मुझे तोड़ रहा था। मैं 23 साल की थी, तभी पिता का निधन हो गया। उस समय मैं करियर में ठीक कर रही थी, लेकिन अंदर से टूट गई थी।
शराब की लत और पछतावा
इस दर्द ने जैस्मीन को ऐसे दौर में धकेला, जहां उन्होंने खुद को खो दिया। वह कहती हैं- मैंने खुद को शराब में डुबो लिया था। मैं बहुत ज्यादा शराब पीती थी और आज भी पछतावा है। उस वक्त वही मेरे लिए सहारा था। मैं पूरी जिंदगी ऐसे सुकून और घर की तलाश में भटकती रही, जो बचपन में नहीं मिला।
खुद को कमजोर और असहाय महसूस करने लगी थी
मेरी मां और परिवार ने रिकवरी में बहुत मदद की। जब मैं टूट चुकी थी, तब भी उन्होंने मुझसे प्यार किया। मेरी सबसे बड़ी लड़ाई खुद से थी। उस समय मुश्किल होता था, क्योंकि दिन शुरू होते ही मैं पुरानी आदतों में फंस जाती थी। मैंने भगवान से प्रार्थना की- ‘प्लीज मुझे बचा लो, मुझे बस एक और मौका दे दो।
मैं बहुत बेबस महसूस कर रही थी। उस दौर से बाहर आने के लिए चीजों को ‘नहीं’ कहने की हिम्मत चाहिए होती है। परिवार का साथ जरूरी है, उनसे दूर मत भागिए। जब मैंने जिंदगी से जहरीली चीजें निकाल दीं, तो लगा जैसे नई जिंदगी मिल गई हो।’
दिल्ली के क्लब्स से शुरू हुआ असली संघर्ष
म्यूजिक इंडस्ट्री में पहचान बनाना आसान नहीं था। 2007 से 2010 के बीच उन्होंने दिल्ली के क्लब्स, कैफे और लोकल इवेंट्स में परफॉर्म किया। उस दौर में न बड़ा प्लेटफॉर्म था और न मजबूत सपोर्ट सिस्टम, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।
वह खुद गाने लिखतीं, कंपोज करतीं और रिकॉर्ड कर मिक्स CDs बनाती थीं। इन्हें 20 रुपए में बेचती थीं, ताकि ज्यादा लोग उनके संगीत तक पहुंच सकें। यही संघर्ष और मेहनत आगे उनके करियर की नींव बना।



