मध्य प्रदेश

अनट्रेंड कोच…नेशनल टूर्नामेंट प्रैक्टिस में जिम्नास्ट की मौत पर सवाल:मैनेजर बोला-हमारे पास सर्टिफाइड कोच ही नहीं; परिवार ने कहा-शव वहीं छोड़कर लौटे बाकी लोग

एमपी के जिम्नास्ट और ‘गोल्डन बॉय’ कहे जाने वाले उजैर अली की दर्दनाक मौत ने प्रदेश के खेल जगत और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली को सवालों के घेरे में ला दिया है। भास्कर की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि उजैर समेत 44 बच्चों का जो दल नेशनल गेम्स खेलने कोलकाता गया था, उनके साथ शिक्षा विभाग ने अनट्रेंड स्टाफ को भेज दिया था।

टीम के साथ जो 8 कोच गए थे वो साधारण टीचर थे। किसी के पास भी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (NIS) पटियाला से जिम्नास्टिक कोचिंग में डिप्लोमा नहीं था। यह एक साल का स्पेशल कोर्स है, जिसमें खिलाड़ियों को ट्रेनिंग देने के साथ ये भी सिखाया जाता है कि चोट लगने पर खिलाड़ी को प्राथमिक उपचार कैसे दिया जाता है?

बता दें कि उजैर अली जिम्नास्टिक का राष्ट्रीय खिलाड़ी था। कोलकाता में नेशनल गेम्स में प्रैक्टिस के दौरान वह घायल हो गया था। कोलकाता के पीजी अस्पताल में उसका 14 दिन तक इलाज चला लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। परिजन का आरोप है कि जैसे ही वह कोलकाता पहुंचे पूरा स्टाफ उन्हें उनके हाल पर छोड़कर वापस एमपी लौट आया।

भास्कर ने जब दल प्रबंधक रामसिंह बनिहार से इन तमाम आरोपों को लेकर बात की तो उन्होंने सारे आरोपों को खारिज किया और कहा कि शिक्षा विभाग ने सर्टिफाइड कोच की भर्ती ही नहीं की। हम साधारण शिक्षक लोग है जो बड़े फैसले लिए जाने थे वो हम नहीं ले सकते थे।

घायल होने के बाद उजैर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

पहले जानिए क्या हुआ था उजैर के साथ 16 जनवरी, 2024। कोलकाता में आयोजित राष्ट्रीय जिम्नास्टिक टूर्नामेंट का दिन। मध्य प्रदेश की टीम से स्वर्ण पदक के सबसे प्रबल दावेदार, उजैर अली, अपने मुकाबले से ठीक पहले वार्मअप कर रहा था। उनके साथ कोच के रूप में अमन वर्मा मौजूद थे। टीम मैनेजर रामसिंह बनिहार के अनुसार, उजैर जिम्नास्ट पर जंप की प्रैक्टिस कर रहा था और अमन उन्हें हाथ से सपोर्ट दे रहे थे।

आत्मविश्वास से भरे उजैर ने कहा, “सर, मैं खुद कर लूंगा।” अमन पीछे हट गए। उजैर ने छलांग लगाई, लेकिन हवा में उसका संतुलन बिगड़ गया और वह सीधे सिर के बल नीचे आ गिरा। उस एक पल ने सब कुछ खत्म कर दिया। उजैर गंभीर रूप से घायल हो चुका था।

एक्सपर्ट बोले- अनुभवी कोच अकेले जंप नहीं करने देता क्या एक युवा खिलाड़ी को अकेले ही जंप लगाने के लिए कोई कोच ऐसे छोड़ सकता है? भास्कर ने जब ये सवाल एक्सपर्ट से किया तो नाम न बताने की शर्त पर वे बोले- एक अनुभवी और प्रशिक्षित कोच कभी भी एक युवा खिलाड़ी को ऐसी जोखिम भरी जंप के लिए अकेले नहीं छोड़ता, खासकर जब वह वार्मअप कर रहा हो।

एक प्रशिक्षित कोच को पता होता है कि खिलाड़ी के आत्मविश्वास और उसकी तकनीकी क्षमता के बीच का महीन अंतर कैसे समझना है। वह या तो उजैर को तुरंत रोक लेता या उसे उस जंप की सही तकनीक और सुरक्षा उपायों के बारे में बताता। लेकिन दुर्भाग्य से, वहां कोई प्रशिक्षित कोच था ही नहीं।

टूर्नामेंट से पहले उजैर प्रैक्टिस करता था। इसी दौरान उसके साथ हादसा हुआ।

टीम के साथ गया था अनट्रेंड स्टाफ मध्य प्रदेश की जिस टीम को कोलकाता भेजा गया था, उसके साथ 8 कोच और 2 मैनेजर समेत कुल 10 लोगों का स्टाफ था। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से किसी के पास भी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (NIS), पटियाला से जिम्नास्टिक कोचिंग में डिप्लोमा नहीं था। यह एक साल का विशेष कोर्स है, जिसमें बताया जाता है कि खिलाड़ियों को ट्रेनिंग कैसे देना है?

उन्हें चोट लगने पर तत्काल प्राथमिक उपचार, गंभीर चोटों से बचाव के तरीके और खेल के दौरान सुरक्षा मानकों जैसी महत्वपूर्ण बातें सिखाई जाती हैं। जो स्टाफ टीम के साथ गया, उनमें से ज्यादातर प्राइवेट स्कूलों के शिक्षक या कुछ सीनियर खिलाड़ी थे, जिन्हें कोचिंग का कोई औपचारिक अनुभव नहीं था।

जिस दल का सिलेक्शन हुआ वो नहीं गया था इस अप्रशिक्षित दल को भेजने का निर्णय भी आनन-फानन में लिया गया। असल में, टूर्नामेंट के लिए 10 दूसरे कोच और मैनेजरों का चयन हुआ था, लेकिन टूर्नामेंट से ठीक 19 दिन पहले उन सभी ने जाने से इनकार कर दिया। इसके बाद, शिक्षा विभाग ने जैसे-तैसे दूसरे लोगों का प्रबंध किया, जिनकी सूची टूर्नामेंट शुरू होने से महज 6 दिन पहले जारी की गई।

यह स्टाफ न तो खेल की बारीकियों को समझता था और न ही टीम के खिलाड़ियों को ठीक से जानता था। इनमें से अधिकांश का जिम्नास्टिक कोचिंग से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। परिजनों का यह भी आरोप है कि ज्यादातर स्टाफ सदस्य इस दौरे को पिकनिक की तरह मान रहे थे और अपने परिवार के सदस्यों के साथ वहां पहुंचे थे। हालांकि, दल मैनेजर रामसिंह ने इस आरोप को खारिज किया।

14 दिन तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष हादसे के बाद उजैर को कोलकाता के पीजी मेडिकल कॉलेज में भर्ती करा दिया। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह और भी शर्मनाक था। 17 जनवरी को, जब उजैर के परिजन कोलकाता पहुंचे, तो 8 कोच और 2 मैनेजरों का पूरा दल बाकी 43 खिलाड़ियों को लेकर मध्य प्रदेश वापस आ गया।

उजैर के मामा शाकिब कहते हैं कि उन्होंने उस बच्चे के साथ रुकना जरूरी नहीं समझा, जो उनके भरोसे, उनके प्रदेश का नाम रोशन करने गया था। वे कहते हैं कि 14 दिन तक हम कोलकाता में परेशान होते रहे। किसी एक भी अधिकारी ने फोन करके यह नहीं पूछा कि बच्चा कैसा है? अगर टीम का कोई सदस्य हमारे साथ होता, तो शायद हम उसे बेहतर इलाज के लिए दिल्ली या किसी और बड़े अस्पताल में शिफ्ट कर पाते।

उजैर की बॉडी लाने में 60 घंटे का संघर्ष 14 दिन तक जिंदगी की जंग लड़ने के बाद उजैर हार गया, मगर परिवार का संघर्ष यहीं खत्म नहीं हुआ। उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने बच्चे के शव को घर लाना था। शाकिब बताते हैं, हम कभी कोलकाता नहीं गए थे। हमें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। पोस्टमॉर्टम कराने में ही 27 घंटे लग गए। फिर शव को कैसे लाएं, यह एक बड़ी समस्या थी।

इंडिगो एयरलाइंस ने तो यह कहकर मना कर दिया कि उनकी फ्लाइट में शव ले जाने की व्यवस्था नहीं है। लगभग 35 घंटे की अथक जद्दोजहद के बाद, परिवार किसी तरह शव को कोलकाता से दिल्ली और फिर वहां से इंदौर तक फ्लाइट से ला पाया। इंदौर से सड़क मार्ग से शव उज्जैन पहुंचा। इस पूरी प्रक्रिया में 60 घंटे से ज्यादा का समय लग गया।

भाई बोला- उसका सपना ओलिंपिक मैडल जीतना था उजैर के चचेरे भाई मोहम्मद गुलखान उसे याद करते हुए बताते हैं कि खेल के प्रति उसका समर्पण जुनून की हद तक था कि वह रोज सुबह 4 बजे उठकर रेलवे के जिम्नास्टिक प्रैक्टिस ग्राउंड पर चला जाता था। चार घंटे की कठोर प्रैक्टिस के बाद स्कूल जाता और शाम को फिर से प्रैक्टिस में जुट जाता। पिछले 6 सालों से उसकी यही दिनचर्या थी।

उसकी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि रेलवे ने उसे ट्रेनिंग के लिए चुना था। वो देश के लिए ओलिंपिक खेलना चाहता था लेकिन व्यवस्था की लापरवाही ने यह सपना हमेशा के लिए छीन लिया।

जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते अधिकारी जब दल प्रबंधक रामसिंह बनिहार से पूछा गया कि वे लोग एक घायल बच्चे को छोड़कर क्यों लौट आए, तो उन्होंने खुद को सदमे में बताते हुए कहा,मुझे बहुत दुख है कि ऐसा हादसा हुआ। मुझे बाकी टीम को भी वापस मध्य प्रदेश लाना था, इसलिए हम आ गए। जब उनसे प्रशासन की तरफ से मदद न मिलने और किसी सदस्य के न रुकने पर सवाल किया गया, तो वे कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।

परिजन की मांग- गैरइरादतन हत्या का मामला दर्ज हो इस घटना ने स्थानीय स्तर पर भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। पार्षद प्रतिनिधि मुजीब सुपारीवाला इसे शिक्षा विभाग के अधिकारियों की गंभीर लापरवाही बताते हुए उन पर गैरइरादतन हत्या का मुकदमा दर्ज करने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने कहा, उजैर मेरे वार्ड का एक होनहार बच्चा था। जब भी बाहर खेलने जाता, मेडल लेकर ही लौटता था। इस बार उसकी लाश आई है।

 

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