किताबों पर कमीशन खा रहे प्राइवेट स्कूल, स्टिंग में खुलासा:यूपी में 180 रुपए की किताब पेरेंट्स 450 में खरीद रहे, कैमरे में देखिए सौदेबाजी

‘अभी हम जहां से कोर्स की बुक्स लेते हैं… वहां 65% कमीशन मिलता है। एकदम से पलटा नहीं मार पाएंगे… देखते हैं कौन-सी लगा सकते हैं… बात करेंगे आपसे। अगर आप ठीक होंगे तो वैरी गुड… बात चलेगी आगे…। अभी कमीशन की बात मत करिएगा… उस चीज की बात तो बाद में होती है। जब कोई बुक लगनी होती है… तो अभी से करना ठीक नहीं है…। मैं आपको बता रहा हूं… 11th-12th में आपकी हिस्ट्री आती हो… हिंदी मीडियम… इंग्लिश मीडियम… दोनों सेम वर्जन… लग जाएगी। आप लाकर दीजिए… हम लगा देंगे…।’
कोर्स की किताबों में ये कमीशन की सौदेबाजी है, जो प्राइवेट स्कूल चलाने वाले कर रहे। इस दलाली में प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट, प्रिंसिपल, उनके खास कर्मचारी और पब्लिशर शामिल हैं। इसलिए यूपी के प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे बच्चों को लिए पेरेंट्स को कोर्स की बुक्स पर मोटा पैसा खर्च करना पड़ रहा।
लखनऊ के एक नामी प्राइवेट स्कूल में क्लास 6th की 8 बुक्स 2,955 रुपए में आ रहीं। वहीं, केंद्रीय विद्यालय (KV) में इसी क्लास की बुक्स केवल 700 रुपए में आ जाती हैं। हर बार नए साल के साथ ये सवाल उठता है कि प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट कोर्स की बुक्स पर कमीशन खाते हैं?
इस पूरे कॉकस में कमीशनखोरी की शुरुआत कैसे होती है? यह समझने के लिए हम सबसे पहले बुक्स सेलर से मिले। गोमतीनगर के विनयखंड में यूनिवर्सल बुक्स डिपो है। यहां से हमें खदरा स्थित दीनदयाल नगर के शिवम बुक्स स्टोर का पता मिला। हमारी मुलाकात बुक सेलर प्रशांत श्रीवास्तव से हुई। उन्होंने बताया कि वे 60% डिस्काउंट पर किताबें देंगे। अब आप स्कूल वालों को 40-45% कमीशन देकर अपनी किताबें लगवा सकते हैं। इसमें आपको 15-20% बच जाएगा।
क्या और बुक सेलर भी स्कूलों को कमीशन देते हैं? क्या ज्यादातर बुक्स सेलर स्कूलों को कमीशन देते हैं? इस बात की पुष्टि के लिए हमने एक अन्य बुक सेलर शुभम श्रीवास्तव को कॉल किया। शुभम ने बताया- हम आपको 45% डिस्काउंट पर किताबें दे देंगे। आप 20-25% कमीशन स्कूल वालों को दे देना। इससे साफ हो गया कि बुक्स सेलर से स्कूल वाले कमीशन लेते हैं।
अब स्कूलों में कमीशन का खेल जानिए…
क्या स्कूल प्रिंसिपल, डायरेक्टर किताबों पर कमीशन की डिमांड करते हैं? इस सवाल के जवाब के लिए हम बुक सेलर बनकर राजधानी लखनऊ के प्राइवेट स्कूलों में पहुंचे। हम सबसे पहले गीतापुरी के KDS पब्लिक स्कूल पहुंचे।
यहां हमारी मुलाकात प्रिंसिपल सुशीला सिंह और उनके बेटे अभिजीत सिंह से हुई। उन्होंने बताया कि वे पब्लिशर्स से किताबें खरीदकर स्कूल मंगाते हैं। यहां से पेरेंट्स को बेच देते हैं। इसमें उन्हें अभी 65% कमीशन मिलता है।

चलिए, दूसरे स्कूल…
KDS पब्लिक स्कूल में हुई हमारी डील से साफ हो गया कि यहां किताबों पर स्कूल संचालक 65% कमीशन लेते हैं। अब हमारे सामने सवाल था कि राजधानी लखनऊ के और स्कूलों में बुक्स पर कितना प्रतिशत कमीशन स्कूल वाले खा रहे हैं?
इसके जवाब के लिए हम गोमतीनगर एक्सटेंशन के KTD पब्लिश स्कूल पहुंचे। यहां हम प्रिंसिपल स्वाति उपाध्याय से मिले। उन्होंने खुद डील फाइनल नहीं की। लेकिन कहा कि आप बता दीजिए, कितना प्रतिशत देंगे तो वे मैनेजमेंट तक यह जानकारी पहुंचा देंगी।

कोई कमीशन नहीं लिया जाता स्कूल से मिले मोबाइल नंबर पर हमने KTD स्कूल के प्रबंधक हीरा ठाकुर से बात की। जब हमने कहा कि आपके स्कूल में किताब लगाने की बात की गई तो आपकी प्रिंसिपल ने पहले कमीशन के बारे में जाना। फिर उन्होंने कहा कि मैनेजर से बात कर लीजिए, वही लोग तय करते हैं। इस पर हीरा ठाकुर ने कहा कि कोई कमीशन नहीं लिया जाता। ये आरोप निराधार है।
अब चलिए, मिशनरी स्कूल…
इस बातचीत से साफ हो गया कि स्कूल संचालक प्रिंसिपल के माध्यम से डील कराते हैं, लेकिन फाइनल वे ही करते हैं। स्कूलों की कमीशनखोरी के इस खेल को समझने के लिए अब हम विनयखंड के सेंट जॉन बास्को स्कूल पहुंचे। ये मिशनरी स्कूल है। यहां हमारी मुलाकात मैनेजर पी फ्रेंक से हुई। उन्होंने ऑफर सुनने के बाद कहा कि हमारे स्कूल में जो किताबें 3 साल पुरानी हो गई हैं, उन्हें बदलकर आपकी किताबें लगा सकते हैं। इसके बाद आगे की बात करेंगे।

अब चलते हैं, चौथे स्कूल… यहां कमीशन का तरीका अलग
यहां हुई बातचीत के बाद साफ हो गया कि मिशनरी स्कूल में भी बुक्स पर कमीशन खाने का खेल चल रहा है। इस खेल को उजागर करने के लिए अब हम स्टेशन रोड गोमतीनगर के सेंट कोलंबस इंटर कॉलेज पहुंचे। यहां हमारी मुलाकात प्रिंसिपल एपी सिंह से हुई। उन्होंने कहा- पहले बुक्स लाइए, अभी कमीशन की बात मत कीजिए। जब बुक्स लग जाएं, तो बात करेंगे।


- कुछ स्कूल बुक सेलर से डील कर रहे हैं। फिर पेरेंट्स को बता देते हैं कि कोर्स की बुक्स कहां मिलेगी? मजबूरन पेरेंट्स को महंगे दामों पर ये बुक्स खरीदनी पड़ रही हैं।
- बुक सेलर 65% डिस्काउंट पर पब्लिशर्स से बुक्स खरीदते हैं और प्रिंट रेट पर पेरेंट्स को बेचते हैं। फिर इनसे 60% तक कमीशन स्कूल ले लेते हैं।
- ये कमीशनखोरी का खेल 1 से 8 क्लास की बुक्स पर ज्यादा हो रहा है, क्योंकि इन क्लास की किताबों को हर 3 साल में बदल सकते हैं।
- प्राइवेट स्कूल अच्छे कंटेंट की किताबों का बहाना बनाकर NCERT की बुक्स की जगह प्राइवेट पब्लिशर्स की बुक्स स्कूल में लगाते हैं, जो पेरेंट्स को महंगे दामों पर खरीदनी पड़ रही हैं।
- ये खेल लंबे समय से चल रहा है, फिर भी यूपी सरकार इस पर अंकुश नहीं लगा रही है, क्योंकि कई बड़े स्कूल नेताओं के हैं।
- हमने बुक सेलर से 6th क्लास की 8 बुक्स खरीदीं, जो हमें 1182 रुपए में मिलीं। इसमें 5% बुक सेलर ने कमाया।
- अगर हम पेरेंट्स बनकर ये बुक्स खरीदते तो हमें 2955 रुपए कीमत देना होती, यानी 1773 रुपए ज्यादा देना होता। ये 1773 रुपए स्कूल मैनेजमेंट को जाता है।
- राजधानी लखनऊ में 219 प्राइवेट स्कूल हैं। इनमें क्लास 1 से 8 तक 1.75 लाख बच्चे पढ़ाई करते हैं।
- अगर स्कूल मैनेजमेंट एक बच्चे पर 1773 रुपए का कमीशन खा रहा है तो 1.75 लाख बच्चों पर कमीशन हुआ- 1.75 लाख x 1773 रुपए = 31.03 करोड़ रुपए सालाना।
- साल 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक पूरे यूपी में 6700 प्राइवेट स्कूल हैं। इनमें 1 से 8 तक के 33.96 लाख बच्चे पढ़ रहे हैं।
- अगर स्कूल मैनेजमेंट एक बच्चे पर 1773 रुपए का कमीशन खा रहा है तो 33.6 लाख बच्चों पर कमीशन हुआ- 33.96 लाख x 1773 रुपए = 602.11 करोड़ रुपए सालाना।
अब जानिए, अंकुश के लिए जो नियम बने, उनका तोड़ कैसे निकालते हैं
राइट-टू-एजुकेशन और नई शिक्षा नीति के तहत बुक्स पर स्कूल मैनेजमेंट की कमीशनखोरी रोकने के लिए नियम बनाए हैं। लेकिन, कुछ स्कूल वालों ने इनका भी तोड़ निकाल लिया है…
- स्कूल के 1 किमी दायरे में बुक्स की दुकान नहीं होना चाहिए। दुकानें 1 से डेढ़ किमी के भीतर हैं। कुछ स्कूल मैनेजमेंट तो स्कूलों से ही किताबें बेच रहे हैं।
- स्कूलों में किताबों की सूची ओपन-टू-ऑल रखना है। स्कूल मैनेजमेंट सूची ओपन तो करते हैं, लेकिन ये किताबें किसी एक निश्चित दुकान पर ही मिलती हैं, कही और नहीं मिलतीं।
- 3 साल से पहले कोर्स की बुक्स नहीं बदली जा सकतीं। अगर किसी और से ज्यादा कमीशन की सेटिंग हो जाती है तो स्कूल मैनेजमेंट बुक्स में खराबी का बहाना बनाकर इसे बदल देते हैं।
इसे लेकर अभिभावक संघ भी खफा, लगाए आरोप यूपी अभिभावक संघ के अध्यक्ष उमाशंकर दुबे ने आरोप लगाया कि कोर्स बदलने से पहले स्कूलों को शिक्षा विभाग को जानकारी देनी होती है। एक भी स्कूल ऐसा नहीं कर रहा। स्कूलों को अपने यहां चलने वाली किताबों की सूची शिक्षा विभाग को बतानी होती है। न तो स्कूल ऐसा कर रहे हैं, न ही शिक्षा विभाग जांच करता है।
स्कूल एसोसिएशन बोला- सरकार ठोस नियम बनाए स्कूल एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी सुधीर हलवासिया ने कमीशन को लेकर कहा- स्कूल को स्कूल ही रहने दिया जाना चाहिए, न कि व्यवसायिक केंद्र बनाना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि ऐसा ठोस नियम बनाए, जिससे कापी-किताबों को लेकर अभिभावकों पर आर्थिक बोझ न पड़े।
मंत्री को सवाल भेजे, जवाब नहीं आया इस संबंध में हमने यूपी की माध्यमिक शिक्षा मंत्री गुलाब देवी से बात करनी चाही, लेकिन उन्होंने अपने दोनों मोबाइल अटैंड नहीं किए। इसके बाद हमने उन्हें सवाल भेजे, लेकिन कई दिन बाद भी उनका जवाब नहीं आया।
