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परेश रावल:गुस्से में शख्स का सिर फोड़ा था:बोले- आज भी पछतावा है; विलेन की इमेज से लोग डरते थे, बाबूराव बनकर बदली पहचान

परेश रावल का नाम सुनते ही लोगों को बाबूराव की कॉमिक टाइमिंग याद आती है, लेकिन उनका करियर सिर्फ कॉमेडी तक सीमित नहीं रहा। एक दौर में उनके खतरनाक विलेन किरदारों से लोग असल जिंदगी में भी डरने लगे थे। फ्लाइट में लोग उनके पास बैठने से कतराते थे और अपनी चीजें छिपाने लगते थे।

इसी इमेज को तोड़ने के लिए उन्होंने कॉमेडी की तरफ रुख किया और बाबूराव, तेजा, डॉ. घुंघरू जैसे किरदारों से कल्ट स्टार बन गए। हाल ही में उन्होंने स्वीकार किया कि गुस्से में एक बार उन्होंने एक शख्स का सिर पत्थर से फोड़ दिया था, जिसका उन्हें आज पछतावा है। थिएटर, फिल्मों और राजनीति में वह हमेशा अपने बेबाक अंदाज के लिए चर्चा में रहे।

सिर्फ कॉमेडियन नहीं, हर किरदार के मास्टर हैं

भारतीय सिनेमा में कुछ कलाकार अपने किरदारों को हमेशा के लिए लोगों की यादों में बसा देते हैं। परेश रावल उन्हीं अभिनेताओं में शामिल हैं। कॉमेडी, विलेन, गंभीर किरदार, सामाजिक फिल्में और ऐतिहासिक भूमिकाओं में उन्होंने खुद को साबित किया।

बाबूराव, तेजा, डॉ. घुंघरू, कानजी मेहता और टिक्कू जैसे किरदार आज भी लोगों की जुबान पर हैं। परेश रावल हर किरदार के लिए अलग तैयारी करते थे और उसी हिसाब से बॉडी लैंग्वेज, आवाज और एक्सप्रेशन बदल लेते थे।

प्रिंसिपल के केबिन में नकली पिता का थप्पड़

परेश रावल का अभिनय सफर थिएटर से शुरू हुआ। कॉलेज के दिनों में उन्हें नाटकों का शौक लग गया था। वह अक्सर क्लास छोड़कर थिएटर रिहर्सल और कैंटीन में समय बिताते थे। अटेंडेंस कम होने पर प्रिंसिपल ने उन्हें माता-पिता को बुलाने के लिए कहा।

तब वह अपने इलाके के एक उम्रदराज दोस्त को नकली पिता बनाकर कॉलेज ले गए। शिकायत सुनते ही उस दोस्त ने एक्टिंग करते हुए उन्हें जोरदार थप्पड़ मार दिया। प्रिंसिपल घबरा गए और बोले, “मारो मत, लड़का बहुत अच्छा है, कॉलेज के लिए ट्रॉफी जीतता है।”

गुस्से में एक शख्स को पीट दिया

थिएटर के दिनों में परेश रावल अपने गुस्से के लिए भी जाने जाते थे। राज शमनी के पॉडकास्ट में उन्होंने बताया कि एक नाटक के दौरान दर्शकों में बैठा एक व्यक्ति लगातार अभद्र टिप्पणियां कर रहा था। गुस्से में वह स्टेज से नीचे उतर गए और उस व्यक्ति को पीट दिया।

थिएटर में हंगामा मच गया और शो रोकना पड़ा। थिएटर मालिक इतने नाराज हुए कि उन्होंने भविष्य में वहां परफॉर्म करने की अनुमति देने से मना कर दिया था।

इसी इंटरव्यू में उन्होंने स्वीकार किया कि एक बार गुस्से में उन्होंने किसी व्यक्ति के सिर पर पत्थर मार दिया था। बाद में उन्हें पछतावा हुआ और उन्होंने उस व्यक्ति से सुलह भी की।

विलेन की इमेज से डरने लगे थे लोग

90 के दशक में परेश रावल ने ‘राम लखन’, ‘कब्जा’ और ‘मोहरा’ जैसी फिल्मों में इतने खतरनाक विलेन रोल किए कि लोग असल जिंदगी में भी उनसे डरने लगे थे। उनकी आंखों के एक्सप्रेशन, भारी आवाज और स्क्रीन प्रेजेंस की वजह से दर्शक उन्हें डरावना मानने लगे थे।

फ्लाइट और पब्लिक प्लेस में लोग उनके पास बैठने से डरते थे और अपनी चीजें छिपाने लगते थे। इसी इमेज को तोड़ने के लिए उन्होंने बाद में कॉमेडी किरदारों की तरफ रुख किया।

फिल्म ‘सर’ में परेश रावल ने अंडरवर्ल्ड डॉन वेलजीभाई पाटेकर का किरदार निभाया। यह उनके शुरुआती करियर के सबसे दमदार नेगेटिव रोल्स में गिना जाता है। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।

दिलवाले में परेश रावल ने मामा ठाकुर का किरदार निभाया था। इस रोल में उनका क्रूर और बेरहम अंदाज दर्शकों को काफी डरावना लगा। उनकी आंखों के एक्सप्रेशन और डायलॉग डिलीवरी इस किरदार की सबसे बड़ी ताकत बने।

रोल की तैयारी के लिए असली किन्नर से मिले

फिल्म ‘तमन्ना’ में परेश रावल ने एक किन्नर का किरदार निभाया, जिसे उनके करियर के सबसे संवेदनशील रोल्स में गिना जाता है। इस रोल की तैयारी के लिए वह असली किन्नरों से मिले थे। उन्होंने उनकी बॉडी लैंग्वेज, बोलने का तरीका और भावनाओं को करीब से समझा। बाद में उन्होंने कहा था कि यह किरदार उन्हें अंदर तक हिला गया था।

सरदार वल्लभभाई पटेल का किरदार निभाना सबसे मुश्किल था

फिल्म सरदार में उन्होंने भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की भूमिका निभाई। इस रोल के लिए उन्होंने सरदार पटेल के भाषण, चाल-ढाल और बॉडी लैंग्वेज पर गहराई से काम किया।

उन्होंने कई इंटरव्यू में कहा था कि ऐतिहासिक किरदार निभाना सबसे मुश्किल होता है, क्योंकि लोग उस शख्सियत को पहले से जानते हैं और छोटी गलती पकड़ लेते हैं।

‘अंदाज अपना अपना’ में परेश रावल।

मीम कल्चर का हिस्सा बने, तो कभी किरदार गले का फंदा बन गया

1994 में आई फिल्म ‘अंदाज अपना अपना’ में परेश रावल ने सीधे-सादे रामगोपाल बाजाज और चालाक विलेन तेजा का डबल रोल निभाया। “तेजा मैं हूं, मार्क इधर है” जैसे डायलॉग बाद में मीम कल्चर का हिस्सा बन गए।

हेरा फेरी का बाबूराव परेश रावल के करियर का सबसे आइकॉनिक किरदार माना जाता है। मोटा चश्मा, धोती-कुर्ता, टूटी हिंदी और शानदार कॉमिक टाइमिंग ने इस किरदार को कल्ट बना दिया। बाबूराव को आम आदमी जैसा दिखाने के लिए परेश रावल ने चार्ली चैपलिन और आर.के. लक्ष्मण के कॉमन मैन से प्रेरणा ली थी।

फिल्म का मशहूर सीन, जिसमें बाबूराव पेइंग गेस्ट को सलाह देता है कि “टॉयलेट का दरवाजा टूटा है, अंदर जाओ तो गाना गाया करो”, असल में परेश रावल का ऑन-द-स्पॉट इम्प्रोवाइजेशन था।

हालांकि इस किरदार की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि बाद में परेश रावल ने कहा था कि बाबूराव उनके लिए “गले का फंदा” बन गया, क्योंकि लोग उन्हें उसी तरह के रोल्स में देखने लगे थे।

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