ओबीसी आरक्षण मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई आज:चार दिन पहले हुई सुनवाई में वकीलों की गैरमौजूदगी को लेकर हुए थे आरोप प्रत्यारोप

ओबीसी को 27% आरक्षण देने से जुड़े मामलों की सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हो सकती है। चार दिन पहले हुई सुनवाई के दौरान सरकारी वकीलों के न पहुंचने का आरोप ओबीसी वर्ग के अधिवक्ताओं ने लगाया था, जिसका विरोध सरकार ने किया था और कहा था कि वकील मौजूद रहे हैं। अब आज होने वाली सुनवाई में सरकार और ओबीसी वर्ग के वकील कोर्ट के समक्ष अपने तर्क रखेंगे।
इसके पहले गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति नरसिंहा और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की खंडपीठ के समक्ष ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी प्रकरण सीरियल नंबर 106 पर अंतिम बहस के लिए सूचीबद्ध थे। ओबीसी वर्ग के वकील अनूप जॉर्ज चौधरी ने अपने जारी बयान में कहा था कि जैसे ही मामलों को कॉल किया गया, मध्य प्रदेश सरकार की ओर से कोई भी वकील उपस्थित नहीं हुआ।
इसके बाद मध्य प्रदेश सरकार की ओर से यह कहा था कि सरकार ओबीसी को 27% आरक्षण देने के लिए प्रतिबद्ध है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज, स्टेंडिंग काउंसिल मृणाल, अलंकार, रूपराह और एडिशनल एडवोकेट जनरल धीरेन्द्र सिंह परमार मौजूद थे।

हाईकोर्ट से सभी केस SC ट्रांसफर
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट से ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करा दिए थे। ओबीसी वर्ग के वकीलों का यह आरोप है कि 27% ओबीसी आरक्षण लागू करने के दबाव से बचने के लिए ऐसा किया गया है। सरकार भर्ती विज्ञापनों में ओबीसी को 27% आरक्षण देने की बात तो कर रही है, लेकिन नियमों के विरुद्ध 13% पद होल्ड किए जा रहे हैं।
ओबीसी को 27% आरक्षण देने वाले कानून पर न हाईकोर्ट ने स्टे दिया है न ही सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है। इसके बावजूद सरकार पिछले एक साल से अधिक समय से सुनवाई में केवल तारीख पर तारीख लेती आ रही है।
आरक्षण रोकने मोहन सरकार ने 150 करोड़ वकीलों को दिए
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कहा है कि ओबीसी आरक्षण को लेकर आज कोर्ट में सुनवाई होने वाली है पर सरकार इसको लेकर गंभीर नहीं है। उन्होंने कहा कि एमपी सरकार ने 150 करोड़ रुपए वकीलों को अलग-अलग समय पर दिए हैं। 25 लाख रुपए सिर्फ वकील को एपियर होने पर फीस के रूप में दिए जा रहे हैं।
पटवारी ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव एक तरफ कहते हैं कि आरक्षण मिलना चाहिए, दूसरी ओर वकीलों को मोटी फीस देकर आरक्षण रोकने का काम किया जा रहा है। यह राजनीतिक रूप से अय्याशी नहीं है तो क्या है? ओबीसी आरक्षण को लेकर मोहन सरकार ने गुमराह करने का काम किया है।


